वॉशिंगटन
भारत में लगातार बढ़ती हिंसक घटनाएं देश को आर्थिक रूप से तगड़ा नुकसान पहुंचा रही हैं। सीएए/एनआरसी, किसान आंदोलन, पैगंबर विवाद के बाद भारतीय सेना के लिए लागू की गई अग्निपथ योजना के कारण देश में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। यही कारण है कि ग्लोबल पीस इंडेक्स में भारत 163 देशों की सूची में 135वें स्थान पर है। वहीं भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन क्रमश 54वें और 138वें स्थान पर काबिज हैं। इन हिंसक घटनाओं में भारत को 646 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है। इन पैसों से देश के बजट को बढ़ाया जा सकता था। कई तरह की कल्याणकारी योजनाएं लागू की जा सकती थीं। लेकिन, हिंसा की आग ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया।
भारत में हिंसा की लागत जीडीपी का 6 प्रतिशत
भारत में हिंसा की आर्थिक लागत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छह फीसदी है। यानी जितनी भारत की जीडीपी है, उसका छह फीसदी हिस्सा सिर्फ हिंसा में नष्ट हो चुका है। पिछले कुछ साल में देश में कई मुद्दों को लेकर हिंसक प्रदर्शन हो चुके हैं। इस कारण कर्फ्यू, इंटरनेट शटडाउन जैसे सख्त कदम भी उठाने पड़े हैं। इनके अलावा आतंकवादी और नक्सली हमलों के कारण भी देश को तगड़ी आर्थिक चोट पहुंच चुकी है। इन घटनाओं में जान-माल की हानि के अलावा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देश को भी नुकसान उठाना पड़ा है।
वैश्विक शांति सूचकांक में आइसलैंड टॉप पर, अफगानिस्तान सबसे नीचे
2022 की रिपोर्ट के अनुसार, आइसलैंड दुनिया का सबसे शांत देश रहा है। दूसरे स्थान पर न्यूजीलैंड और तीसरे पर आयरलैंड काबिज है। वहीं, सबसे ज्यादा अशांत देशो में अफगानिस्तान टॉप पर है। 163 देशों के इस सूचकांक में भी अफगानिस्तान को आखिरी स्थान मिला है। इसके ऊपर यमन और सीरिया काबिज हैं। ये तीनों देश गंभीर रूप से आतंकवाद और गृहयुद्ध का सामना कर रहे हैं।
हिंसा से प्रभावित देशों की संख्या में इजाफा
वैश्विक शांति सूचकांक 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, हिंसक आंतरिक संघर्ष का सामना करने वाले देशों की संख्या 29 से बढ़कर 38 हो गई, लेकिन आंतरिक संघर्षों में मारे गए लोगों की संख्या 2017 के बाद से कम हुई है। अफ्रीका के बाद दक्षिण एशिया दुनिया का दूसरा सबसे अशांत क्षेत्र रहा है। सीरिया, दक्षिण सूडान और मध्य अफ्रीकी गणराज्य में हिंसा के कारण सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान हुए हैं। जबकि आइसलैंड, कोसोवो और स्विटजरलैंड सबसे कम प्रभावित देश रहे हैं।
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