नई दिल्ली
11 जून को पेरिस में इंडो पैसिफिक इकॉनमिक फ्रेमवर्क (IPEF) की एक अनौपचारिक बैठक हुई थी। रिपोर्ट्स बताती हैं कि IPEF को लेकर भारत चिंतित है क्योंकि डर है कि अमेरिका इसके जरिए लंबे वक्त से द्विपक्षीय व्यापार परेशानियों जैसे टैरिफ को हल करने की मांग कर सकता है। दी प्रिंट की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत इस पर विचार कर रहा है कि क्या भारत को IPEF का हिस्सा होना चाहिए या नहीं।
क्या है भारत का डर?
बता दें कि IPEF को 23 मई को जापान में 13 इंडो-पैसिफिक देशों के साथ लॉन्च किया गया था। बताया गया था कि IPEF के जरिए व्यापार, आर्थिक और निवेश के अवसरों को बढ़ाया जाएगा। लेकिन इससे नई दिल्ली क्यों परेशान है? रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े कई मसले अनसुलझे हैं। ऐसे में भारत को लगता है कि यह मसले इस फ्रेमवर्क के तहत आ सकते हैं और IPEF अंत में एक तरह का व्यापार समझौता साबित हो सकता है। प्रिंट ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि भारत शुरू में IPEF से जुड़ने का इच्छुक नहीं था क्योंकि उसे डर था कि अमेरिका वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्क को खत्म करने, आईपीआर और पेटेंट व्यवस्था में कुछ संशोधनों और डेटा संरक्षण के लिए काम करेगा।
IPEF में शामिल हो सकता है भारत?
IPEF कुछ हद तक आश्वासन दे सकता है कि एक पारंपरिक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) नहीं हो सकता है, यही वजह है कि भारत, जिसने बाजार पहुंच और मूल उल्लंघनों के नियमों के बारे में चिंताओं के कारण चीनी RCEP में शामिल होने से इनकार कर दिया था। लेकिन IPEF को लेकर हां-ना की स्थिति में पहुंच चुका है जहां जल्द ही इस बात का फैसला हो सकता है कि भारत IPEF के साथ जुड़ेगा या नहीं?
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