ग्वालियर-चंबल में भाजपा OBC व SC वर्ग को साधने में लगी

राजनीती

ग्वालियर
मध्य प्रदेश की सियासत के बड़े केंद्र ग्वालियर-चंबल अंचल में जातिगत राजनीति के सामने सारे मुद्दे गौण हो जाते हैं। अंचल की राजनीति में बसपा के शून्य की स्थिति में पहुंचने के बाद भाजपा और कांग्रेस का पूरा फोकस ओबीसी व एससी वर्ग पर है। यही वजह है कि भाजपा ने पहले अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की कमान गोहद के पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री लालसिंह आर्य को सौंपी।

हाल ही में पार्टी ने ग्वालियर के दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री नारायण सिंह कुशवाह को भाजपा पिछड़ा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। इसके पीछे उद्देश्य ओबीसी और एससी वर्ग के वोटरों का खोया विश्वास हासिल करना है।

 

ग्वालियर में भी भाजपा 57 साल बाद महापौर की सीट हारी
दरअसल, केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे दिग्गज नेताओं के बावजूद भाजपा को वर्ष 2020 में हुए उपचुनाव और हाल ही में हुए नगरीय निकाय चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। नरेन्द्र सिंह तोमर के संसदीय क्षेत्र मुरैना से भाजपा ने एससी के लिए आरक्षित महापौर की सीट गंवा दी। वहीं, सिंधिया के प्रभाव वाले ग्वालियर में भी भाजपा 57 साल बाद महापौर की सीट हार गई।

बीते दो विधानसभा चुनाव के परिणाम के विश्लेषण से साफ होता है कि अंचल में भाजपा की स्थिति खराब और कांग्रेस की मजबूत होती गई। 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में ग्वालियर-चंबल अंचल की 34 विधानसभा सीटों में से 26 सीटें भाजपा के पास थीं। वर्ष 2018 में हुए चुनाव में दृश्य एकदम पलट गया।

 

उपचुनाव में भाजपा को अंचल में 13 और कांग्रेस को नौ सीटें थी मिलीं
ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमल नाथ के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस अंचल से एससी के लिए आरक्षित सभी आठ सीटें जीतने के साथ 34 में से 25 सीटों पर कब्जा कर लिया। भाजपा को आठ और बसपा को एक सीट मिली थी। 2020 में अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम में ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक 22 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। प्रदेश में एक बार फिर भाजपा ने सरकार बना ली। इसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा को अंचल में 13 और कांग्रेस को नौ सीटें मिलीं।

इसलिए भाजपा से छिटकता चला गया एससी वर्ग
2018 के चुनाव से ठीक पहले एट्रोसिटीज एक्ट के विरोध की आग इसी अंचल में सबसे ज्यादा भड़की। दंगों में आठ लोगों को जान गंवानी पड़ी। इससे सत्ता में बैठी भाजपा से इस वर्ग ने किनारा कर लिया। कांग्रेस इस वोट बैंक को साधने में कामयाब हुई। हालांकि, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एससी वोटर को खुश करने के लिए एक नारा दिया था कि कोई माई का लाल आरक्षण खत्म कर सकता। एससी का विश्वास तो वे हासिल नहीं कर पाए, उलटा सवर्ण उनसे नाराज हो गया। नतीजतन भाजपा सत्ता में नहीं आ पाई। अब 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस सतर्क हो गई हैं। दोनों वर्गो को साधने के लिए एससी और ओबीसी के प्रमुख पदों पर अंचल के नेताओं जिम्मेदारी इसी रणनीति का हिस्सा है।

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