भोपाल
उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था शरीर में आत्मा की तरह है। भारतीय शिक्षा मनुष्यता की तरफ ले जाती है। यह सृष्टि से हमारा विशेष संबंध जोड़ती है। आज पूरी दुनिया में उपभोगवादी संस्कृति हावी है। इस उपभोगवाद के आगे क्या है, यह जानने के लिए पूरे विश्व को भारत की ओर ही देखना पड़ेगा।
मंत्री डॉ. यादव एलएनसीटी महाविद्यालय में भारतीय शिक्षण मंडल की विश्वविद्यालय इकाई के तीन दिवसीय अखिल भारतीय अभ्यास वर्ग के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत में शिक्षा व्यवस्था हमेशा महत्वपूर्ण रही है। भगवान कृष्ण भी कंस को मारने के बाद राजसिंहासन छोड़ कर शिक्षा प्राप्ति के लिए उज्जैन आए थे। उनके गुरु ऋषि सांदीपनी का चरित्र एक आदर्श आचार्य की तरह है। विश्वविद्यालय के आचार्य का जीवन कैसा होना चाहिए, ऋषि सांदीपनी हमें यह सिखाते हैं।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर थे। सत्र को सम्बोधित करते हुए उन्होंने भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्राचीन समय में शिक्षा, गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों तरह से श्रेष्ठ थी। हमारे शैक्षणिक संस्थान वास्तव में वैश्विक थे। तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय में विश्व भर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसी भाव के अनुरूप भारत में शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की कल्पना की गई है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को लर्निंग सेंट्रिक बनाए जाने की आवश्यकता बताई। कार्यक्रम में म.प्र. निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के अध्यक्ष डॉ. भरत शरण सिंह ने प्रस्तावना प्रस्तुत की। कार्यक्रम में एलएनसीटी यूनिवर्सिटी के चांसलर जे.एन. चौकसे उपस्थित थे।
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