अमिताभ पाण्डेय
भोपाल । सामाजिक संस्था यंगशाला में गत दिवस भोपाल गैस त्रासदी के 38 सालों के दर्द और संघर्ष की कहानियों पर बातचीत हुई। इस दौरान मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट के डीन पद से सेवानिवृत हुए डॉ. डी के सथपथी और भोपाल गैस पीड़ितों के साथ काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने अपने अनुभव बताए।
डॉ. सथपथी ने चर्चा के दौरान बताया था कि 2 – 3 दिसम्बर, 1984 की उस रात मेरे सीनियर डॉ. ने मुझसे कहा कि शवगृह में जल्दी पहुचों वहां आज बहुत ज्यादा लोगों की जरूरत है। जब मैं अस्पताल पहुंचा मैंने देखा बहुत सी लाशें पड़ी थी। शवगृह में हम 3 ही डॉक्टर थे और इतनी लाशों का पोस्टमार्टम करना संभव नहीं था। इसलिए हमने मेडिकल कॉलेज के फाइनल ईयर के छात्रों और हमारे इन्टर्न की मदद ली।उन्होंने कि त्रासदी इतनी भयंकर थी कि ताजुल मस्जिद से फैक्ट्री तक लोग खांसते – कराहते , मरते हुए गिर रहे थे। जो लोग हॉस्पिटल पहुंच भी रहे थे उन्हें भी इलाज नहीं मिल पा रहा था। किसी को पता ही नही था कि इसका इलाज क्या है। हमारे डीन ने फैक्ट्री के डॉ. लोया को फोन करकर कई बार पूछा ये कौन सी गैस ?
इसका एंटीडोट क्या है ?
डॉ लोया ने बताया कि उन्हें कंपनी ने इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। गैस त्रासदी के बाद इसके पीड़ितों के संघर्ष और सरकार की लापरवाहियों के बारे में बात करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने बताया कि इस पूरी घटना में पीड़ितों के प्रति सरकार का व्यवहार बहुत ही निराशाजनक रहा है। उन्हें बार बार अलग अलग तरीकों से बेज्जत किया गया है। सरकार ने बिना किसी पीड़ित से पूछे अपनी हिसाब से कंपनी से पैसा मांगा और कोर्ट के बाहर ही अपनी मांग के सातवे हिस्से के अमाउंट पर ही सेटलमेंट कर लिया।
आज की परिस्थियों के बारे में बात करते हुए वो कहती है कि 42 कॉलोनियों में अब भी प्रदूषण है वहां का गंदा पानी पीड़ित और उनके परिवारों को पीना पड़ रहा है।
साफ पानी की मांग को लेकर दिल्ली तक पीड़ितों ने कई यात्राएं की है पर परिस्थितियां आज भी जस की तस है।
रचना के अनुसार गैस पीड़ितों को आज भी सही इलाज नहीं मिल पा रहा । वो कहती है डॉक्टर को पता ही नहीं है कि क्या इलाज देना आज भी सिम्टम्स देखकर इलाज होते हैं। दवाइयां खाकर कई पीड़ितों की किडनियां खराब हो गई।इस पूरी चर्चा के दौरान गैस त्रासदी से जुड़े कई सारे सवाल युवाओं ने वक्ताओं से किए जिसका वक्ताओं ने जवाब दिया। चर्चा के अंत में वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान ने पद्मश्री से सम्मानित गैस पीड़ितों की आवाज जब्बार भाई को श्रद्धांजलि देते हुए उनके संघर्ष के बारे में युवाओं को बताया।
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