कोरोना के बाद बढ़ी दिमाग की परेशानियां, विशेषज्ञों ने बताया- अब पैरों से होगा ब्रेन स्ट्रोक का इलाज

उत्तर प्रदेश राज्य

 गोरखपुर 

कोरोना के बाद बदली जीवन शैली से ब्रेन स्ट्रोक के मामले बढ़ गए हैं। अब इसके शिकार बुजुर्गों के साथ युवा भी हो रहे हैं। असामान्य स्ट्रोक के मामले भी बढ़े हैं। यह कहना है न्यूरोसर्जन डॉ. अश्वनी मिश्र का। वह शनिवार को ब्रेन स्ट्रोक पर आयोजित कार्यशाला में बतौर वक्ता बोल रहे थे। इसका आयोजन गोरखपुर में सेंटर फॉर ब्रेन एंड स्पाइन ने किया है। इसमें ब्रेन स्ट्रोक के इलाज की नई तकनीकों पर डॉक्टरों ने चर्चा की। इस सेमिनार में गोरखपुर, लखनऊ, बनारस, आगरा, दिल्ली, मुम्बई और बंगलुरु के विशेषज्ञ शामिल हुए। इसमें न्यूरो सर्जन के साथ न्यूरोलॉजिस्ट भी मौजूद रहे। 

न्यूरोसर्जन डॉ. सौरभ श्रीवास्तव ने बताया कि हर एक लाख में 150 ब्रेन स्ट्रोक के मामले सामने आते हैं। कोविड के बाद से इस संख्या में और इजाफा हो रहा है। ब्रेन स्ट्रोक महिलाओं से अधिक पुरुषों में होता है। पहले साढ़े चार घंटे गोल्डन आवर है। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. संतोष कुमार सिंह ने बताया कि इस्मिक स्ट्रोक में दिमाग की धमनियों में खून के थक्के जम जाते हैं। इसकी इलाज की पद्धति बेहद सरल है। पैर की नसों के जरिए दिमाग की धमनियों तक पहुंचा जा सकता है। जहां जमे खून के थक्के को साफ किया जाता है। इसे एंडोवैस्कुलर मैकेनिकल थ्रांबेक्टमी कहते हैं।
 
ब्रेन स्ट्रोक में दिमाग में टेढ़ी हो जाती हैं नसें  
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जन डॉ. सतीश नायक और न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. नागेंद्र वर्मा ने बताया कि सेरीब्रो-वैस्कुलर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इन मरीजों का ब्लड प्रेशर अनियंत्रित होता है। इनके दिमाग की नसों में टेढ़ापन अधिक होता है। कई बार इन्हें बगैर वजह सिरदर्द होता है। यह अक्सर यह मरीज शौच करने के दौरान बेहोश हो जाते हैं। इसका इलाज क्वाइलिंग या क्लिपिंग के जरिए होता है। सेमिनार में डॉ. राकेश सक्सेना, डॉ. एके ठक्कर, डॉ. नागेश चंद्रा, डॉ. तारीक मतीन, डॉ. रविशंकर, डॉ. पल्लव कुमार, आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. शिवशंकर शाही और डॉ. गौरव पाण्डेय मौजूद रहे।
 

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