देहरादून
जोशीमठ बड़े बोल्डर, मिट्टी और रेत पर बसा हुआ है, जो ग्लेशियर मटीरियल है। यहां बिना ड्रेनज और सीवर मैनेजमेंट के आबादी बसी है। लूज मटीरियल (मिट्टी-रेत) में होटल, घर समेत तमाम भवनों का पानी घुसने से भू-धंसाव हो रहा है, ऐसी स्थिति में अब जोशीमठ को बचाना है तो सरकार को मजबूत ड्रेनेज और सीवर मैनेजमेंट सिस्टम बनाना होगा, यह सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि जमीन के अंदर पानी ना जाए। यह कहना है कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रॉक मैकेनिक्स के निदेशक एवं जियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीआईएस) के पूर्व निदेशक डॉ. पीसी नवानी का। डॉ. पीसी नवानी की निगरानी में वर्ष 2003 में उत्तरकाशी में वरुणावत भूस्खलन का ट्रीटमेंट हुआ और ट्रीटमेंट के लिए पीएमओ की ओर से गठित तकनीकी कमेटी का चेयनमैन रहे।
बातचीत में डॉ. पीसी नवानी ने बताया कि उत्तरकाशी और जोशीमठ की परिस्थितियां अलग हैं। उत्तरकाशी में शहर के ऊपर से वरुणावत पर्वत से भूस्खलन हुआ था। तब शहर को शिफ्ट करने की बात हुई थी, लेकिन हमारी कमेटी ने ट्रीटमेंट का फैसला लिया वहीं आज जोशीमठ की परिस्थिति बिल्कुल अलग है। वहां भूधंसाव हो रहा है।
आवाज तो उठी, पर नहीं दिया गया ध्यान
डॉ. नवानी ने कहा कि यह समस्या वहां 1980 से शुरू हो गई थी, तब इसके कारण और ट्रीटमेंट को लेकर आवाज तो उठी, लेकिन ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। यहां आबादी बढ़ती गई। बिना ड्रेनेज और सीवर मैनेजमेंट सिस्टम के व्यावसायिक और आवासीय भवन बनते गए। सभी का पानी जमीन में रिसता गया, जिस कारण लूज मटीरियल पानी के बहता गया। इसमें जो बोल्डर हैं वह अब लोडिंग संभाल नहीं पा रहे हैं।
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