हरियाणा
जम्मू और कश्मीर में 1980 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में कश्मीरी पंडितों पर जो जुल्म ढाए गए, उसे कभी शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उससे भी बड़ी प्रताड़ना ये कि इन कश्मीरी पंडितों के दुख-दर्द को कम करने के लिए कई सरकारों के पास मरहम भी कम पड़ गए। आज की तारीख में भी उनके आंसू पोंछने के लिए सारी सरकारें उसी तरह से तैयार नहीं हैं, जो उनकी आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि उनका अधिकार है। क्योंकि, किसी भी भारतीय नागरिक को उसके अपने घर से ही बेघर होना पड़ जाए और वह भी मुट्ठी भर लोगों के निहित स्वार्थों की वजह से, तो यह असहनीय पीड़ा वाली स्थिति है। लेकिन, हरियाणा की सरकार ने प्रवासी कश्मीरी परिवारों को भी सहारा देने का काम किया है।
यह सिर्फ मानवीय संवेदना की बात नहीं है। यह भारत में किसी भी चुनी हुई सरकार की जिम्मेदारी भी है; और हरियाणा ने उसे पूरी तरह से निभाने की कोशिश की है। कश्मीरी परिवारों को वित्तीय सहायता जम्मू और कश्मीर से पलायन करके हरियाणा के किसी भी भाग में आकर रह रहे कश्मीरी परिवार को प्रदेश सरकार की ओर से वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाई जाती है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की इससे अच्छी खूबसूरती नहीं हो सकती। सबसे बड़ी बात ये है कि यह सहायता कश्मीरी परिवारों के अनुसार ही नहीं दी जाती, बल्कि परिवार में कितने सदस्य हैं, यह उसपर भी निर्भर करता है। यानि जितना बड़ा परिवार, उसी के अनुसार सरकार से वित्तीय सुरक्षा की गारंटी।
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