जब कर्नाटक बना कांग्रेस का संकटमोचक, कराई इंदिरा गांधी की वापसी, अब मल्लिकार्जुन खड़गे का टेस्ट

देश

 नई दिल्ली

चुनावी आंकड़ों के लिहाज से संकट से जूझ रही कांग्रेस के लिए कर्नाटक का मैदान संजीवनी साबित हो सकता है। इसके संकेत पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिरा गांधी के समय से मिलते हैं। कहा जाता है कि करीब 44 साल पहले कर्नाटक ने कांग्रेस को बड़े संकट से उबारा था। इसके अलावा यह चुनाव नए राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिहाज से भी खास होने वाला है।

जानकार बताते हैं कि कर्नाटक पहले भी कांग्रेस का रक्षक रहा है। 1977 में सिकुड़ रही कांग्रेस का साथ कर्नाटक ने 'इंदिरा अम्मा' के जरिए दिया। इतना ही नहीं इंदिरा ने चिकमंगलूर उपचुनाव में जीतकर लोकसभा में वापसी भी की थी। उस दौरान डीबी चंद्र गौड़ा कांग्रेस सांसद थे। उन्होंने इंदिरा के लिए यह सीट छोड़ दी थी। तब इंदिरा गांधी की उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के गढ़ रायबरेली में बड़ी हार हुई थी। हालांकि, इसके बाद भी उनकी लोकसभा सदस्यता चली गई थी और उन्हें सजा भी हुई थी।

खड़गे का रोल
कहा जा रहा है कि कर्नाटक चुनाव से जुड़ी छोटी से छोटी चीजों का ध्यान खुद खड़गे रख रहे हैं। यह उनका गृहराज्य भी है। खबर है कि वह राज्य में जनता दल सेक्युलर के साथ गठबंधन के बिल्कुल मूड में नहीं हैं। उन्होंने कथित तौर पर इसके लिए पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी मना लिया है। इसके अलावा 2024 लोकसभा चुनाव के लिहाज से भी कर्नाटक का रण खास है।

दूर हुईं दूरियां!
खबरें थीं कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश कांग्रेस प्रमुख डीके शिवकुमार के बीच सीएम फेस को लेकर तनातनी थी। हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि खड़गे ने फिलहाल इस चुनौती से भी पार पा लिया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस के अंदर यह उनकी काफी बड़ी जीत है। पार्टी 124 उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर चुकी है।

जब खुद चूके खड़गे
9 बार के विधायक खड़गे अपने ही राज्य में मुख्यमंत्री बनने से तीन बार चूके। इनमें 1999 में एस एम कृष्णा, 2004 में एन धर्म सिंह और 2013 में सिद्धारमैया के सामने निराशा का शिकार होना पड़ा।

लगातार हार
हाल ही में हुए कई विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा है। गुजरात चुनाव में पार्टी ने हार का नया रिकॉर्ड बनाया। हालांकि, हिमाचल प्रदेश में सत्ता वापसी ने कांग्रेस का मनोबल बढ़ाया था, लेकिन पूर्वोत्तर के नतीजों ने एक बार फिर चिंता में डाल दिया है। ऐसे में कर्नाटक में जीत दर्ज करना पार्टी के लिए आंकड़ों और मनोबल के लिहाज से बेहद जरूरी है।

 

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