ग्लोबल वार्मिंग या प्रदूषण का असर, प्रचंड गर्मी से 2030 तक आर्कटिक में पिघल जाएगी समुद्री बर्फ

देश

नई दिल्ली
 दिनोंदिन बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग ने बड़ा संकट पैदा कर दिया है। जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ तेजी से पिघलने लगी है। जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी दुनिया में मौसम का क्रम भी बिगड़ने लगा है। इस कारण दुनिया के कई देश भीषण गर्मी, बाढ़ की विभीषिका और जंगलों में भीषण आग का सामना कर रहे हैं।

2030 तक आर्कटिक में पूरी तरह पिघल जाएगी समुद्री बर्फ
एक नए अध्ययन में विज्ञानियों ने चिंता जताई है कि वर्ष 2030 तक आर्कटिक में समुद्री बर्फ पूरी तरह पिघल जाएगी। इससे जहां महासागर का जलस्तर बढ़ने से द्वीपों के डूबने का खतरा पैदा होगा, वहीं ध्रुवीय भालू जैसे कई जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास और अस्तित्व गहरे संकट में फंस जाएगा। इस अध्ययन के निष्कर्ष को नेचर जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

ग्रीन हाउस गैसों से प्रकृति को हुआ बहुत नुकसान
दक्षिण कोरिया में पोहांग यूनिवर्सिटी आफ साइंस एंड टेक्नोलाजी में येओन-ही किम के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा किए गए अध्ययन में चिंता जताई गई है कि ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) के लगातार उत्सर्जन से प्रकृति को बहुत नुकसान हो रहा है। स्थिति यह है कि पहले के पूर्वानुमानों से दस वर्ष पहले ही बर्फ पूरी तरह पिघल सकती है।

आर्कटिक समुद्री क्षेत्र में आई तेजी से गिरावट
    अध्ययन में कहा गया है कि हाल के दशकों में आर्कटिक समुद्री बर्फ क्षेत्र (एसआइए) में वर्ष 2000 के बाद से तेजी से गिरावट आई है।
    विज्ञानियों ने बताया कि आर्कटिक महासागर में समुद्री बर्फ क्षेत्र वर्ष के दौरान बढ़ता और सिकुड़ता है।
    अतिरिक्त समुद्री बर्फ सर्दियों में बनती है, समुद्री बर्फ क्षेत्र में वृद्धि होती है और आमतौर पर मार्च में इसकी अधिकतम सीमा तक पहुंच जाती है।
    इसके विपरीत, गर्मियों में पिघलने के बाद सितंबर में समुद्री बर्फ का क्षेत्र सबसे कम हो जाता है।
    अध्ययन में बताया गया कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि, आर्कटिक क्रायोस्फीयर में मानवीय गतिविधियां तेज होने और 1980 के दशक के बाद से एल चिचोन ज्वालामुखी विस्फोट के बाद से आर्कटिक में समुद्री बर्फ तेजी से कम हुई है।
    अध्ययन में कहा गया है कि पिछले माडलों में समुद्री बर्फ में कमी के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के योगदान को कम करके आंका है।
    इस अध्ययन में विज्ञानियों ने उन्नत जलवायु माडल के साथ उपग्रह अवलोकनों की तुलना की।
    शोधकर्ताओं ने 1979-2019 की अवधि के दौरान हर महीनों में आर्कटिक समुद्री बर्फ क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों का पूरा रिकार्ड तैयार किया और विश्लेषण किया।

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन बर्फ पिघलने का कारण

2021 में आई आइपीसीसी की छठी क्लाइमेट रिपोर्ट में कहा गया था कि इस सदी के अंत तक आर्कटिक के ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे, लेकिन नई रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले 10 साल में ही ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएंगे। इससे आर्कटिक पर रहने वाले जीव जन्तुओं का घर छिन जाएगा।

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