खुलासा : शरद पवार बाबरी मस्जिद बचाने सेना तैनात करना चाहते थे

राजनीती

मुंबई
6 दिसम्बर, 1992 को जब कारसेवकों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा, तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री, शरद पवार रक्षा मंत्री, एस.बी. चव्हाण गृहमंत्री और माधव गोडबोले गृह सचिव थे। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे।

शरद पवार ने अपने संस्मरण ‘अपनी शर्तों पर’ में बताया है कि कैसे प्रधानमंत्री एक पूर्व महारानी के वादे पर भरोसा कर कार सेवकों पर सख़्ती करने से बचते रहे।

पवार लिखते हैं, “वह (नरसिम्हा राव) निश्चय ही इस तरह का विध्वंस नहीं चाहते थे लेकिन इस विध्वंस को रोकने के आवश्यक उपाय भी उन्होंने नहीं किए। मैंने भरसक उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि विवादित ढांचे को गिराने के लिए कारसेवक किसी भी सीमा तक जा सकते हैं; परन्तु वह इस बात से भयभीत थे कि यदि सेना ने गोली चलाई और कुछ लोग मर गए तो यह हिंसा की आग पूरे देश में फैल जाएगी।”

पवार ने दिया था सुझाव

चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली सरकार गिरने के बाद पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने थे। पवार का मानना है कि चंद्रशेखर अयोध्या विवाद को सुलझाने के बहुत करीब पहुंच गए थे। वह लिखते हैं कि “अगर चंद्रशेखर की सरकार छह या इससे कुछ अधिक दिनों तक बनी रहती तो यह विवादित मुद्दा निश्चित ही सुलझा लिया जाता। इस सरकार के गिरने के बाद अवरुद्ध हुई प्रक्रिया को दोबारा प्रारंभ नहीं किया जा सका। इसी दौरान भाजपा और आर.एस.एस. तथा इनके अनुषंगी संगठनों ने अयोध्या मुद्दे पर पूरे देश में हिन्दू उन्माद फैलाना शुरू किया। “

पवार का मानना है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार थी इसलिए उन्माद फैलाना आसान हो गया। वह लिखते हैं, “विश्व हिन्दू परिषद (वी.एच.पी.) और इसके सहयोगी संगठन जब 6 दिसम्बर की परिघटना की तैयारी में लगे थे तब केन्द्र सरकार अनेक चर्चाओं में व्यस्त थी। मैंने इस विषय पर कठोर कदम उठाने का सुझाव दिया। गोडबोले का भी यही मत था लेकिन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव शक्ति प्रयोग के पक्ष में नहीं थे। मैंने सावधानी की दृष्टि से विवादित ढांचे पर सेना की टुकड़ियां तैनात करने का सुझाव रखा परन्तु इसे अस्वीकार कर दिया गया।”

खुफिया विभाग को दिया था खास काम

प्रधानमंत्री राव ने अपने रक्षा मंत्री का सुझाव अस्वीकार कर दिया। इसके बाद पवार ने सेना के गुप्तचर विभाग के अधिकारियों को 6 दिसम्बर की सारी गतिविधियों की वीडियोग्राफी करने का आदेश दे दिया। अधिकारियों ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने में शामिल नेताओं के साथ कारसेवकों की गतिविधियों की फोटोग्राफी की।

नरसिम्हा राव से कितने किया था वादा?

शरद पवार ने अपने संस्मरण में बताया है कि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से ग्वालियर की पूर्व महारानी और भाजपा के संस्थापकों में से एक विजयाराजे सिंधिया ने वादा किया था। पवार लिखते हैं, “नेशनल इंट्रीजेशन काउंसिल की बैठक में राजमाता विजयाराजे सिंधिया सहित भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने अभियान के दौरान कानून का उल्लंघन न करने का स्पष्ट आश्वासन दिया था और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने लिखित रूप से आश्वासन दिया था कि विवादित स्थल पर किसी भी अवांछनीय घटना को सरकार रोकेगी।”

जब शरद पवार ने जोर देकर कहा कि इन नेताओं पर विश्वास करना खतरनाक है तो नरसिम्हा राव ने कहा, “मैं राजमाता के शब्दों पर पूर्ण विश्वास करता हूं। मैं जानता हूं, वह मुझे नीचा नहीं दिखाएंगी।”

बाबरी विध्वंस के बाद की बैठक

प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव, एस.बी. चव्हाण और शरद पवार 6 दिसम्बर की शाम एक आपातकालीन बैठक में शामिल हुए। इस बैठक में गृह सचिव माधव गोडबोले ने विस्तार से बाबरी मस्जिद विध्वंस करने की घटना का विवरण पेश किया। बकौल पवार, “गृह सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि भाजपा और अन्य हिन्दूवादी संगठनों के नेताओं ने किस प्रकार इस घटना में भूमिका निभाई जिन पर प्रधानमंत्री ने पूरा विश्वास किया था। पूरी मीटिंग में प्रधानमंत्री केवल अचम्भे में ही रहे।”

 

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