जयपुर
राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार की ओर से लिए गए एक फैसले से ना सिर्फ भगवा कैंप नाराज है, बल्कि कांग्रेस के अपने संगठन ने भी असंतोष जाहिर किया है। राजस्थान में स्टूडेंट यूनियन का चुनाव इस सत्र में ना कराए जाने के फैसले को लेकर भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के साथ ही कांग्रेस का नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) भी नाराज है। पिछले महीने से ही एनएसयूआई और एबीवीपी के छात्र नेता चुनावी तैयारी में पूरे दमखम से जुटे हुए थे, लेकिन 12 अगस्त को एक आदेश जारी करके सरकार ने चुनाव पर रोक लगा दी, जिससे दोनों सगंठन के सदस्य हैरान रह गए।
राज्य के शिक्षा विभाग ने आदेश में कहा कि उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों और कुलपतियों ने एक बैठक के दौरान बताया कि लिंगदोह समिति के प्रस्तावों का उल्लंघन किया जा रहा है। इसके अलावा छात्र संघ चुनाव में धन-बल का इस्तेमाल किया जा रहा है। कुलपतियों ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के विभिन्न प्रावधानों को लागू करना भी एक चुनौती था। चुनाव पर रोक को लेकर विभिन्न विश्वविद्यालयों में परीक्षा परिणाम में देरी और एडमिशन प्रक्रिया में विलंब की वजह से 180 दिनों के शैक्षणिक दिवस सुनिश्चित किए जाने का हवाला दिया।
यह आदेश उस दिन जारी किया गया जब गहलोत ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि वह लिंगदोह समिति के प्रावधानों के उल्लंघन को लेकर चिंतित हैं। छात्र नेता बड़ी मात्रा में धन का इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकार के इस आदेश से सभी छात्र संगठन नाराज हो गए। एबीवीपी और एनएसयूआई के सदस्य सोमवार को धरने पर बैठ गए। जयपुर स्थित राजस्थान यूनिवर्सिटी में जोरदार हंगामा हुआ। एबीवीपी के 200 कार्यकर्ता वीसी सचिवालय में घुस गए और स्टाफ को बंधक बना लिया। एबीवीपी नेता हुश्यार सिंह मीणा ने कहा कि उनके सगंठन के सदस्यों ने राज्यभर में विरोध प्रदर्शन किया है और आने वाले दिनों में आंदोलन को और तेज किया जाएगा। एबीवीपी के अलावा कांग्रेस के छात्र नेता भी अपनी सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं। एनएसयूआई ने गहलोत सरकार से फैसले को बदलने की मांग की है। एनएसयूआई के प्रदेश प्रमुख अभिषेक चौधरी ने कहा, 'हम चाहते हैं कि छात्र संघ चुनाव कराए जाएं। हम सरकार से चुनाव कराने की मांग करते हैं ताकि छात्र राजनीति की पहली पाठशाला में हिस्सा ले सकें।'
भाजपा नेताओं ने गहलोत सरकार पर निशाना साधा है। राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता राजेंद्र राठौर ने कहा, 'लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रसंघ चुनाव राजनीति की पहली सीढ़ी होते हैं। पिछले छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई का एक भी प्रत्याशी किसी विश्वविद्यालय में नहीं जीता था। इस बार भी विश्वविद्यालयों/ महाविद्यालयों में एनएसयूआई की मिट्टी पलीत होने और संभावित हार से बचने के लिए तानाशाही सरकार ने छात्रसंघ चुनाव पर रोक लगाई है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के उल्लंघन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत सेमेस्टर सिस्टम लागू नहीं होने का हवाला देने वाली सरकार की मंशा चुनाव कराने की है ही नहीं, क्योंकि चुनावी वर्ष में सरकार भली भांति समझ गई है राज्य का युवा से जुड़े छात्र संगठन एनएसयूआई को वोट नहीं देगा, इसलिए चुनाव ही नहीं करवाए जा रहे हैं। जिन विश्वविद्यालयों/ महाविद्यालयों में न्यूनतम 180 दिन अध्यापन कार्य करवाना भी चुनौतीपूर्ण हो तो राज्य की शैक्षणिक स्थिति की दुर्दशा का अंदाजा साफ लगाया जा सकता है। मैं भी आज जिस मुकाम पर हूं वह छात्र राजनीति की बदौलत ही हूं। सरकार का यह फैसला छात्र हितों की आवाज बुलंद करने वाले कई छात्र नेताओं और आम छात्र के लोकतांत्रिक अधिकार पर कुठाराघात है।'
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