गौर दास महाराज ने कहा संसार में तन और धन के ग्राहक तो हैं पर मन का कोई नही

छत्तीसगढ़ रायपुर

रायपुर

संसार में तन-धन के ग्राहक तो हो सकते हैं पर मन के नहीं, मन के ग्राहक हैं तो केवल मोहन। समुद्र की लहर जब आना बंद हो जायेगी तब स्नान करूंगा ऐसा सोंचे नहीं, भगवान का भजन करने के लिए समय निकालें। मन को लगायें। हृदय अखंड होगा तभी प्रभु विराजेंगे यदि फ्लैट की भांति अलग-अलग स्टोरी बना लेंगे तो मन का यह तिकड़म भगवान को स्वीकार नहीं। नंद का हृदय बहुत बड़ा है इसलिए कृष्ण उनके घर प्रगट हुए हैं। यशोदा जिन्होने किसी का कभी अपयश नहीं किया, बुरा नहीं चाहा। गोकुल में अब दीवाली है के धुन पर कथा स्थल में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर श्रद्धालु जमकर नाचे गाये।

सिंधु पैलेस शंकरनगर में चल रही भागवत कथा में गौर दास जी महाराज ने भगवान कृष्ण के प्राकट्य महोत्सव पर बताया कि नंद मतलब जिनका हृदय निर्मल और विशाल है,किसी के प्रति अपराध या भूल हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं, जीवन में सबको क्षमा कर देते हैं, इसलिए कि हृदय तो भगवान के रहने का घर है। जबकि आज संसारी जीव जिंदगी बीत जाती है पर मरते दम तक शत्रुता नहीं छोड़ते हैं,जाते जाते भी बेटे को कहते इनसे संबंध न रखना। यशोदा जिन्होने जीवन में सबको यश दिया, अपयश नहीं। अब कान्हा जिनके गोद में खेले वह कोई सामान्य तो नहीं। भक्ति के तीन मार्ग बताते हुए कहा कि ब्रम्हानंद-ज्ञानियो-योगियों को प्राप्त मोक्ष का सुख, प्रेमानंद-प्रभु के सगुण साकार रूप का सुख और सेवानंद-सेवा का सानिध्य पाकर जो सुख मिले। ब्रजवासियों में इतनी खुशियां है कि दूध, दही, गरम जल, घी और केसर मिलाकर ऐसा रंग बना रखे हैं जिससे वहां भादो में भी होली का नजारा दिख रहा है। मक्खन के गोले बनाकर गेंद की तरह खेल रहे हैं।

प्रसंगवश उन्होने आगे बताया कि तन और धन के ग्राहक तो मिल जायेंगे पर मन के नहीं, मन के ग्राहक तो केवल मोहन हैं। विडंबना देखें यदि 40-45 वर्ष में व्यक्ति रोगी हो गया और घर परिवार की जरूरत के लिए काम करने के योग्य न रहे तो मुक्ति और 80 वर्ष के उम्र में भी कमाऊं रहे तो आवश्यक समझतें हैं।

जाति, वर्ग व व्यवस्था के नाम पर न लड़ें-
कथा व्यास ने समाज के मठाधीशों को आगाह करते हुए कहा कि जाति, वर्ग व व्यवस्था के नाम पर न लड़ें, समाज को न बांटे। आपस में टकराव न हो, विरोध करें विधर्मी का, गौ हत्या करने वालों का, सनातन की खिलाफत करने वालों का। ये भारत हमारी माता है, लेकिन आज लोगों की वृत्ति भटक गई है। चाहे किसी भी माध्यम से हो भजते तो उसी एक को है न।

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