नई दिल्ली
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फैसला किया है कि देश की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने और पूर्वोत्तर राज्यों में जनसांख्यिकी संरचना को बनाए रखने के लिए भारत और म्यांमार के बीच मुक्त आवाजाही व्यवस्था को खत्म कर दिया जाएगा।
गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमारी सीमा को सुरक्षित करने का संकल्प लिया है। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्रालय फिलहाल इसे खत्म करने की प्रक्रिया में है। ऐसे में गृह मंत्रालय ने मुक्त आवाजाही को तत्काल निलंबित करने की सिफारिश की है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले गृह मंत्रालय ने म्यांमार से लगती देश की 1643 किमी की सीमा पर बाड़ लगाने का फैसला किया था। इसके साथ ही निगरानी की सुविधा के लिए सीमा पर एक गश्ती ट्रैक भी बनाया जाएगा। सीमा की कुल लंबाई में से मणिपुर के मोरेह में 10 किमी की दूरी पर पहले ही बाड़ लगाई जा चुकी है।
अभी तक क्या चल रहा था?
'मुक्त आवाजाही समझौते' यानी फ्री मूवमेंट रेजीम के तहत अभी तक भारत और म्यांमार के नागरिक बिना पासपोर्ट और वीजा के महज एक परमिट के सहारे एक-दूसरे की सीमा में आ-जा सकते थे. इसके कारण दोनों तरफ के नागरिकों को दूसरे देश की सीमा में 16 किलोमीटर दूर तक जाकर वहां अधिकतम दो सप्ताह रहने की अनुमति थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम में कुछ दिन पहले कहा था कि केंद्र सरकार ने अब तक खुली भारत-मिजोरम सीमा पर बांग्लादेश की तर्ज पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने का फैसला किया है. इसके साथ ही म्यांमार के साथ दशकों पुराने मुक्त आवाजाही समझौते को भी खत्म कर दिया जाएगा.
पूर्वोत्तर के 4 राज्यों से लगी है म्यांमार की सीमा
अरुणाचल प्रदेश में 520 किमी, नागालैंड में 215 किमी, मणिपुर में 398 किमी और मिजोरम में 510 किमी मतलब कुल 1,643 किमी लंबी सीमा म्यांमार से लगी है. इसमें से 1,472 किमी लंबी सीमा की शिनाख्त का काम पूरा हो गया है. मोरे में बाड़ लगाने का काम भी शुरू हो गया है. इस काम में चार से पांच साल का समय लगने की संभावना है. बाड़ लगाने का काम पूरा होने के बाद सीमा पार से आने वाले लोगों के लिए भारत का वीजा लेना अनिवार्य होगा.
फैसले के पीछे क्या है वजह?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने मुख्य दो वजहों को देखकर यह कदम उठाया है. पहली वजह है कि हाल ही में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुआ है जिसके बाद सीमावर्ती इलाकों में म्यांमार की सेना और विद्रोही गुटों में हिंसक झड़पें बढ़ी हैं. इसका असर भारतीय इलाकों पर भी देखने के लिए मिल रहा है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, म्यांमार में जारी हिंसा के कारण 20 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं. इसके कारण 40 हजार के करीब लोग, पुलिस और सैन्य अधिकारियों ने मिजोरम और मणिपुर में शरण ली है.
दूसरी वजह के बारे में कहा जा रहा है कि बीते साल मई में मणिपुर में हुई हिंसा के पीछे म्यांमार से आने वाले उग्रवादियों और सशस्त्र गुट जिम्मेदार हैं. इसको देखते हुए भारत सरकार ने यह बड़ा कदम उठाया है. पूर्वोत्तर के चार राज्यों की म्यांमार से लगी सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग एक ही जाति और संस्कृति के हैं. इसलिए सीमा पार से आने वाले लोग आसानी से स्थानीय आबादी में घुलमिल जाते हैं. इसलिए आपराध करने वालों की अलग से पहचान नहीं हो पाती.
मुक्त आवाजाही समझौता क्या था?
बर्मा (अब म्यांमार) के भारत से अलग होने के बाद एक ही जातियों वाले कुछ गांव दोनों देशों के अलग-अलग बंट गए. देश की आजादी के बाद केंद्र सरकार को महसूस हुआ कि अलग-अलग देश में रहने के कारण एक ही जनजाति के लोगों के जीवन और रहन-सहन में कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं. इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 सितंबर, 1950 को एक गजट अधिसूचना के जरिए पासपोर्ट नियमों में संशोधन करते हुए दोनों देशों के नागरिकों को बिना पासपोर्ट और वीजा के एक-दूसरे के देश में 40 किमी भीतर तक आने की छूट दे दी थी.
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