दमोह : आबकारी विभाग ने वित्तीय वर्ष में 322 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त करने का लक्ष्य रखा

मध्य प्रदेश राज्य

दमोह

दमोह जिले में वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए शराब दुकानों के ई-टेंडर की प्रक्रिया शुरू हो गई है। आबकारी विभाग ने इस बार बड़ा बदलाव करते हुए जिले की सभी 58 शराब दुकानों को एक ही समूह में बांट दिया है। इससे पहले ये दुकानें चार समूहों में विभाजित थीं।

आबकारी विभाग ने इस वित्तीय वर्ष में 322 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। इस बार शराब ठेकों के आवंटन के लिए ई-टेंडर प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी, लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाएगा।

बड़े कारोबारियों और सिंडिकेट को मिलेगा लाभ
शराब दुकानों को एक समूह में रखने के कारण छोटे ठेकेदारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। टेंडर आवेदन के लिए डिपॉजिट राशि तो जमा कर सकते हैं, लेकिन टेंडर पास होने पर समूह की रिजर्व प्राइस का 10 प्रतिशत (लगभग 32 करोड़ रुपये) बैंक गारंटी के रूप में देना अनिवार्य होगा। यह शर्त छोटे कारोबारियों के लिए भारी साबित हो सकती है, जबकि बड़े कारोबारी और सिंडिकेट आसानी से इस प्रक्रिया को पूरा कर सकते हैं।

पिछली प्रक्रिया क्यों हुई थी निरस्त?
फरवरी 2024 में दमोह जिले के शराब ठेकों की लॉटरी प्रणाली के जरिए नीलामी होनी थी। इस नीति के तहत, 20 प्रतिशत राशि बढ़ाते हुए 322 करोड़ रुपये का टारगेट रखा गया था। हालांकि, किसी भी ठेकेदार ने न तो लॉटरी प्रक्रिया में भाग लिया, न ही नवीनीकरण (रिनुअल) के लिए आवेदन दिया। इस वजह से लॉटरी प्रक्रिया रद्द करनी पड़ी और अब ई-टेंडरिंग प्रणाली अपनाई गई है।

ठेकेदारों में असमंजस, कौन होगा विजेता?
इस नई नीति से जिले के शराब ठेकेदारों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। वर्ष 2024-25 में शराब दुकानें चार समूहों में विभाजित थीं और कुल 270 करोड़ रुपये का राजस्व लक्ष्य था। इस बार 20 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 322 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया है और पूरा जिला एक समूह में शामिल किया गया है। अब देखना यह होगा कि दमोह का कोई ठेकेदार इस चुनौती को स्वीकार करता है या कोई बाहरी बड़ा समूह इस नीलामी को जीतता है।

राजस्व बढ़ेगा
इस संबंध में जिला आबकारी अधिकारी रविंद्र खरे ने बताया कि आयुक्त के निर्देशानुसार जिले की 58 दुकानों को एक समूह में शामिल करते हुए ई-टेंडर प्रक्रिया लागू की गई है। यह निर्णय सरकार की नई आबकारी नीति के तहत लिया गया है और राजस्व बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

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