प्रशांत किशोर ने कहा- बिहार में बदलाव जरूरी है, सीएम नीतीश कुमार को हटाना जरूरी है

राज्य

पटना
जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर सिताब दियारा से शुरू हई बिहार बदलाव यात्रा लेकर 15 दिनों में लगभग 20 विधानसभा घूम चुके हैं। 30 से ज्यादा बड़ी और 50 से ऊपर छोटी सभाएं कर चुके हैं। सारण, सिवान और गोपालगंज के अलावा वैशाली, मुजफ्फरपुर और मोतिहारी में भी कदम रख चुके हैं। लगभग 20-25 मिनट का भाषण करते हैं। हर भाषण का खाका एक जैसा है। दुर्दशा क्यों है, वोट जिस मुद्दे पर दिया वो हुआ, लालू नौंवी फेल बेटे की भी सोचते हैं, आपको अपने बच्चों का 15 इंच का सीना नहीं दिखता लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 56 इंच दिखता है। बिहार में बदलाव जरूरी है, सीएम नीतीश कुमार को हटाना जरूरी है। मोदी कहें तो भी नीतीश को नहीं चुनना है।

पीके के नाम से मशहूर चुनाव रणनीतिकार से राजनेता बन चुके प्रशांत किशोर की यह यात्रा 243 सीटों तक जाएगी। हर विधानसभा में एक बड़ी और दो छोटी सभा उनकी योजना में शामिल है। ये माना जा रहा है कि चुनाव की घोषणा के कुछ दिन पहले ही उनकी यह यात्रा समाप्त होगी। जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक उनकी बातें चल रही हैं लेकिन वो खुद को मुख्यमंत्री का कैंडिडेट भी नहीं बताते। कहते हैं कि सीएम बनना छोटा सपना है। उनका सपना बड़ा है। वो अपने जीवनकाल में वो दिन देखना चाहते हैं जब महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब से लोग काम करने बिहार आएं।

जन सुराज पार्टी को कितना वोट मिलेगा, सीट कितनी मिलेगी, ये प्रशांत किशोर को भी नहीं पता है। वो कह रहे हैं कि बिहार में बदलाव होगा, ये तय है। नीतीश कुमार जाएंगे, ये तय है। जन सुराज की सरकार बनेगी, इसकी गारंटी नहीं है। प्रशांत किशोर जैसा अनुभवी चुनावी विशेषज्ञ अगर कह रहा है कि जन सुराज की सरकार पक्की नहीं है लेकिन नवंबर के बाद नीतीश सीएम नहीं रहेंगे तो इस बात को गहराई से देखने और समझने की जरूरत है। बिहार में नीतीश के हटने पर क्या-क्या संभावना बनती है, उन विकल्पों पर नजर डालने से पहले कुछ चुनावी नंबर को समझते हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), लोक जनशक्ति पार्टी-रामविलास (एलजेपी-आर), हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) को बिहार की 40 में 30 सीट और 47.23 प्रतिशत वोट मिला है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले विपक्षी महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस, सीपीआई-माले, सीपीआई, सीपीएम और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) को 40 में 9 सीट और 39.21 परसेंट वोट मिला है। पूर्णिया में निर्दलीय पप्पू यादव जीते और कांग्रेस में संभावना तलाश रहे हैं। दोनों गठबंधन के बीच 8 परसेंट वोट का अंतर है। ये बड़ा अंतर है, जिसे पाटने के लिए सीएम-इन-वेटिंग तेजस्वी परेशान हैं।

लोकसभा चुनाव में 8 परसेंट का फासला था, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में दोनों अलायंस के बीच महज .03 फीसदी का गैप था। एनडीए ने 37.26 फीसदी वोट के साथ 125 सीटें जीती थीं। महागठबंधन को 37.23 फीसदी वोट के साथ 110 सीटें मिली थीं। तब चिराग पासवान की लोजपा अलग लड़ी थी और उसे 5.66 फीसदी वोट के साथ 1 सीट मिली थी। मुकेश सहनी की वीआईपी तब एनडीए के साथ थी, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ गठबंधन में लड़ी थी। कुशवाहा की पार्टी सबसे ज्यादा 99 सीट लड़ी लेकिन एक ना जीत सकी। मायावती ने 1 जीती लेकिन विधायक जेडीयू में चला गया। ओवैसी के 5 विधायक जीते।

अगर 2020 के चुनाव के हिसाब से चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा का वोट एनडीए के साथ जोड़ दें तो 44.69 परसेंट वोट बन जाता है। महागठबंधन में मुकेश सहनी का वोट जोड़ें तो 38.75 परसेंट बनता है। ओवैसी से महागठबंधन की बात चल रही है, जिनके 5 विधायकों में 4 को राजद ने बाद में मिला लिया था। ओवैसी की पार्टी के भी वोट को जोड़ लें तो महागठबंधन के पास 2020 के हिसाब से 39.99 परेंसट वोट बनता है। लगभग 5 फीसदी वोट का गैप।
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