नई दिल्ली
ईरान और इजरायल के बीच जारी जंग का असर चीन पर भी पड़ता नजर आ रहा है। खबर है कि ईरान से मिलने वाले सस्ते तेल पर चीन खासा निर्भर है और उसके पास इसका कोई और विकल्प नहीं है। हालांकि, इसे लेकर चीन या ईरान की ओर से आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। इजरायल ने ऑपरेशन राइजिंग लॉयन के तहत शुक्रवार को ईरान पर एयर स्ट्राइक कर दी थी। तब से ही दोनों देशों में संघर्ष जारी है।
न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के डिस्काउंट रेट पर मिलने वाले तेल पर निर्भर होने और दूसरा विकल्प नहीं होने के कारण चीन उर्जा सुरक्षा संकट का सामना कर रहा है। सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि रूसी तेल का एक विकल्प है, लेकिन उसकी सीमित सप्लाई है और सिर्फ करीब 1 डॉलर प्रति बैरल का डिस्काउंट देता है। वहीं, वेनेजुएला का तेल कमजोर गुणवत्ता का माना जाता है। साथ ही इसके चीन तक ट्रांसपोर्ट किए जाने में भी परेशानियां हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा कि ईरान का पतन होता है, तो इससे न सिर्फ ऊर्जा संकट खड़ा हो जाएगा, बल्कि चीन की अर्थव्यवस्था पर भी खतरा मंडराने लगेगा। इसके अलावा ईरान में शासन परिवर्तन होता है, तो संभव है कि ईरान दोबारा डॉलर पर व्यापार करने लगे, जिससे चीन की मुद्रा पर भी असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि अगर ऐसा होता, तो चीन को हर साल 20-30 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है, क्योंकि ईरान का तेल एक बार फिर खुले बाजार में पहुंच जाएगा।
सूत्रों ने चैनल को बताया है कि मौजूदा शासन का पतन BRI यानी बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के तहत ईरान और मध्य एशिया में चीन की डील को भी नुकसान होगा। उन्होंने बताया कि ईरान पर पश्चिमी देशों की पाबंदियां हैं, जिसके चलते चीन के पास मोल भाव करने की शक्तियां हैं और वह ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है।
सूत्रों ने यह भी कहा है कि इस सुविधा के खत्म होने और डिस्काउंट रेट पर तेल नहीं मिलने का खासा असर टीपॉट रिफाइनरी पर होगा। उन्होंने बताया कि अगर ये डिस्काउंट खत्म होता है, तो ऐसी 40 फीसदी रिफाइनरी बंद हो सकती है, जिसके चलते नौकरियां जाना और ईंधन की कमी जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
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