उन्नाव
उत्तर प्रदेश के जनपद उन्नाव में एक बड़ी ही मानवीय संवेदना से भरी घटना ने साबित कर दिया कि पुलिस, खास तौर पर उत्तर प्रदेश की पुलिस, सिर्फ कानून की ही नहीं, बल्कि संवेदनशील भावनाओं और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी का भी पूरा ख्याल रखती है। उन्नाव जनपद के सफीपुर कोतवाली प्रभारी सुब्रत नारायण त्रिपाठी ने वह काम किया, जो एक अभिभावक, एक मार्गदर्शक और एक सच्चे इंसान का कर्तव्य होता है। लखनऊ से आरओ/एआरओ की परीक्षा देने आई एक छात्रा ऋषिका सिंह रेलवे फाटक बंद होने के कारण रास्ते में फँस गई। उसे जल्द ही परीक्षा केंद्र पहुंचना था। समय बिल्कुल कम था, जगह अनजानी थी, डर था कि जीवन की सबसे अहम परीक्षा छूट न जाए।
ऋषिका और उसके पिता दुलारी सिंह परेशान हाल सड़क पर खड़े थे। ट्रेन के गुजरने के कोई आसार दिखाई नहीं पड़ रहे थे। ऋषिका रुआंसी हो रही थी। तभी जैसे देवदूत के रूप में आई खाकी वर्दी की मदद। सुब्रत त्रिपाठी भी फाटक के बाहर ट्रेन निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। ऋषिका और उसके पिता को परेशान और चिंतित देखकर त्रिपाठी ने उनसे कारण पूछा। दुलारी सिंह ने उन्हें सारी बातें बताईं। त्रिपाठी ने हालात को समझा और एक पल की देरी किए बिना बेटी और उसके पिता को अपनी सरकारी गाड़ी में बैठाया और शॉर्टकट रास्ते से परीक्षा केंद्र तक समय से पहुँचाया।
ऋषिका के पिता ने बताया कि "वे अपनी बेटी को लेकर हसन गंज के परीक्षा केंद्र पहुंचे तो पता चला कि वे गलत केंद्र में आ गए हैं। उन्हें बताया गया कि उनका केंद्र 20 किमी दूर दूसरी जगह है। वे हड़बड़ाते हुए दूसरे केंद्र के लिए निकले तो रेलवे फाटक के पास फंस गए थे। पिता का कहना था कि रेलवे फाटक बंद होने से वे बिल्कुल निराश हो चुके थे। त्रिपाठी की मदद से वे जब केंद्र में पहुंचे तो सिर्फ तीन चार मिनट का समय बचा था।"
त्रिपाठी की संवेदनशीलता का सच्चा पुरस्कार था– बेटी की आँखों में आभार और पिता के शब्दों में दुआ। इसी के साथ समाज को मिला एक सच्चा संदेश कि "पुलिस सिर्फ डर की नहीं, भरोसे की भी प्रतीक है।" सलाम है ऐसी सोच, ऐसे अधिकारी और ऐसी खाकी वर्दी को।
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