एलएम बेलवाल की नियुक्ति पर विवाद, नियमों की अनदेखी और आपत्तियों को किया गया नजरअंदाज

मध्य प्रदेश राज्य

भोपाल 

मध्यप्रदेश के राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन में एल.एम. बेलवाल की संविदा नियुक्ति को लेकर बड़ा प्रशासनिक विवाद सामने आया है। मंत्री और अपर मुख्य सचिव (एसीएस) स्तर के अफसरों की आपत्ति के बावजूद बेलवाल को मिशन के सीईओ जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया। खुलासा हुआ है कि यह नियुक्ति तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस के हस्तक्षेप पर की गई थी, जिन्होंने नोटशीट पर लिखा था कि "मुख्यमंत्री जी की सहमति है।

18 माह बाद मिली संविदा नियुक्ति, नियमों को रखा गया ताक पर
कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल द्वारा विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने बेलवाल की नियुक्ति से जुड़ी सभी नोटशीटें प्रस्तुत कीं। दस्तावेजों से स्पष्ट हुआ कि बेलवाल को सेवानिवृत्ति के 18 महीने बाद, 17 जुलाई 2020 को बिना किसी विज्ञप्ति या वित्तीय अनुमोदन के ओएसडी बनाया गया और महज 12 दिन बाद 29 जुलाई 2020 को मिशन का सीईओ नियुक्त कर दिया गया। खास बात यह रही कि मिशन में "ओएसडी" नाम का कोई पद था ही नहीं यह पद विशेष रूप से बेलवाल के लिए बनाया गया। इससे पहले 20 जून 2020 को तत्कालीन सीईओ शिल्पा गुप्ता को उनके पद से हटा दिया गया था।

एसीएस और मंत्री ने जताई थी आपत्ति
तत्कालीन एसीएस मनोज श्रीवास्तव ने नोटशीट में स्पष्ट लिखा था कि राष्ट्रीय आजीविका मिशन में सीईओ का पद किसी संविदा आईएएस अधिकारी को नहीं दिया जा सकता, वह भी बिना प्रक्रिया और वित्तीय सहमति के। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला अदालत में चुनौती योग्य है। इस पर तत्कालीन मंत्री महेन्द्र सिंह सिसोदिया ने भी सहमति जताई। इसके बावजूद, अंततः मुख्य सचिव के हस्तक्षेप से बेलवाल की नियुक्ति हुई।

क्या लिखा था तत्कालीन मुख्य सचिव ने?
मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस ने अपनी टिप्पणी में लिखाा था कि जब तक नया आईएएस अधिकारी पदस्थ नहीं होता, तब तक बेलवाल को सीईओ का प्रभार दिया जा सकता है, क्योंकि मुख्यमंत्री जी की सहमति है। इसके बाद एसीएस ने अपनी टिप्पणी में उच्च स्तर से मिले निर्देशों के अनुसार आदेश जारी करने लिखा और प्रति मुख्यमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव कार्यालय और सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को भेजे जाने की अनुशंसा की।

3 वर्षों में 3,500 करोड़ के आदेश बिना मंजूरी के जारी
जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि वर्ष 2021 से 2023 के बीच करीब 3,500 करोड़ रुपये के कार्यादेश बिना वित्तीय अनुमोदन के जारी किए गए। यह गंभीर वित्तीय अनियमितता मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि एक वरिष्ठ महिला अधिकारी के कार्यकाल में नियमों को नजरअंदाज कर कई नियुक्तियां और कार्यादेश जारी किए गए। इस प्रकरण में एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है और विस्तृत जांच जारी है। 

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