उमरिया
मध्यप्रदेश के टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या में इजाफा तो हो रहा है, लेकिन उनके प्राकृतिक आवास यानी जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। कारण है जंगल के भीतर बसे सैकड़ों गांव, जो न सिर्फ जगह घेर रहे हैं, बल्कि जंगल के संतुलन को भी प्रभावित कर रहे हैं। अब तक राज्य के टाइगर रिजर्व क्षेत्रों से 200 से अधिक गांवों को विस्थापित किया जा चुका है। बावजूद इसके, इतने ही गांव अभी भी जंगलों के भीतर बसे हुए हैं। इनके कारण बाघों को उनके लिए जरूरी क्षेत्रफल नहीं मिल पा रहा है। साथ ही, इन गांवों की वजह से घास के मैदान विकसित नहीं हो पा रहे हैं, जो शाकाहारी वन्य जीवों के लिए जरूरी हैं।
घास के मैदान क्यों जरूरी हैं?
जंगल के अंदर जब घास के मैदान नहीं बनते, तो शाकाहारी प्राणियों की संख्या कम हो जाती है, जिससे बाघ जंगल के कोर जोन से बाहर आकर गांवों की ओर बढ़ते हैं। वहां वे मवेशियों का शिकार करते हैं, जिससे मानव-पशु संघर्ष बढ़ता है।
वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट डॉ. राकेश शुक्ला के अनुसार, जब तक जंगल के अंदर बसे गांवों को पूरी तरह से हटाया नहीं जाता, तब तक बाघों को उनका आवश्यक क्षेत्र नहीं मिलेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी हाल ही में यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार विस्थापन प्रक्रिया को तेज करेगी और इसके लिए धन की कोई कमी नहीं होगी।
सबसे ज्यादा प्रभावित टाइगर रिजर्व
पन्ना टाइगर रिजर्व में सबसे ज्यादा गांव बसे हैं। बांधवगढ़ के कोर जोन में 10 गांव हैं। पेंच टाइगर रिजर्व में 44, संजय टाइगर रिजर्व में 34, वीरांगना रानी दुर्गावती में 81 और कान्हा में 8 गांव अब भी मौजूद हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े?
प्रदेश में 9 टाइगर रिजर्व हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश की कोर और बफर जोन में गांव बसे हैं। उदाहरण के तौर पर, बांधवगढ़ में 165, कान्हा में 129, पेंच में 123 और सतपुड़ा में 62 बाघ हैं।
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