नई दिल्ली
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना खुद को ड्रोन युद्ध के लिए तैयार कर रही है। अंबाला के पास नारायणगढ़ फील्ड फायरिंग रेंज में सेना का वायु समन्वय युद्धाभ्यास चल रहा है। यह अभ्यास पांच दिन चलने वाला है। पश्चिमी और दक्षिणी कमांड इसमें हिस्सा ले रहे हैं। इसमें कई तरह के ड्रोन के संचालन और ड्रोन हमले से बचने पर फोकस है।
वेस्टर्न कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार के मुताबिक, सेना अब ड्रोन का काफी इस्तेमाल कर रही है। खास तौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में सप्लाई के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है। ड्रोन ऑपरेशन को लेकर ऑपरेशन सिंदूर से काफी सबक मिला है। ऐसे में ड्रोन के निर्माण और सेना को उसकी ट्रेनिंग पर फोकस किया जा रहा है।
उन्होंने कहा अगर फिर से किसी दु्श्मन के साथ भिड़ंत होती है तो उसे और बड़ी सजा दी जाएगी। इस युद्धाभ्यास में जिन ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है वे स्थानीय स्तर पर ही बनाए गए हैं। इनकी रेंज पांच किलोमीटर तक है और ये 5 किलो वजन ले जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि आर्मी के पास ज्यादा रेंज और ज्यादा पेलोड ले जाने वाले ड्रोन भी मौजूद हैं।
कटियार ने कहा कि आने वाले समय में लॉजिस्टिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हजारों ऐसे ड्रोन की जरूरत पड़ेगी। वहीं इन ड्रोन से हमला करने के लिए जिन हथियारों का इस्तेमाल होगा, उन्हें देश में ही तैयार किया जाएगा। बता दें कि ना सिर्फ युद्ध के समय में बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के समय भी सेना ड्रोन का इस्तेमाल करतीहै। बाढ़ के दौरान भी उत्तर और पश्चिमी कमांड ने राहत सामग्री पहुंचाने में ड्रोन का खूब इस्तेमाल किया गया।
इस युद्धाभ्यास में दोनों कमांड को अलग-अलग नाम दिया गया है। एक का नाम सूर्यादेश और दूसरे का चंद्रादेश है। दोनों अलग-अलग देशों के तौर पर एक दूसरे के साथ युद्धाभ्यास कर रहे हैं। इन ड्रोन से बम बरसाए जा रहे हैं और उनसे बचने में भी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अधिकारियों ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद हमें समझ में आ गया है कि कैसे दुश्मन के ड्रोन से निपटा जा सकता है और कैसे दुश्मन को ड्रोन से पस्त किया जा सकता है। इस अभ्यास में शामिल अधिकारियों ने कहा कि सेना के अलावा अब ड्रोन का इस्तेमाल खेती में भी किया जा रहा है। इसके लिए सरकार ने 'ड्रोन दीदी' स्कीम भी चलाई है जिसके तहत महिलाओं को ड्रोन की ट्रेनिंग दी जाती है।
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