अनिल अंबानी की कंपनियों पर कसा शिकंजा, सरकार ने खोली जांच की फाइल

बिज़नेस

मुंबई 
अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस ग्रुप के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। पहले से ही ईडी, सीबीआई और सेबी की जांचों का सामना कर रहे समूह पर अब कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) ने भी शिकंजा कस दिया है। मंत्रालय ने समूह की कई प्रमुख कंपनियों में कथित फंड के दुरुपयोग और कंपनी कानून के गंभीर उल्लंघनों की जांच गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) को सौंप दी है। मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि मंत्रालय की शुरुआती जांच में बड़े पैमाने पर फंड डाइवर्जन और कंपनी एक्ट के उल्लंघन के संकेत मिले हैं। इसके बाद मामला SFIO को सौंपा गया है ताकि फंड के फ्लो और जिम्मेदारी तय करने के लिए विस्तृत जांच की जा सके।

किन कंपनियों पर कार्रवाई
जिन कंपनियों पर जांच का दायरा बढ़ाया गया है, उनमें रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर, रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस और CLE प्राइवेट लिमिटेड जैसी फर्में शामिल हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि समूह की कई कंपनियों के बीच पैसों का कृत्रिम लेन-देन किया गया, जिससे फंड को एक से दूसरे खाते में ट्रांसफर कर उसकी असली स्थिति छिपाई जा सके।

ईडी ने जब्त की ₹7,500 करोड़ की संपत्तियां
SFIO की जांच से पहले ही ईडी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए रिलायंस ग्रुप से जुड़ी ₹7,500 करोड़ से अधिक की संपत्तियां जब्त की थीं। इनमें रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की करीब 30 संपत्तियां और कई रियल एस्टेट कंपनियों जैसे आधार प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी, मोहनबीर हाईटेक बिल्ड, विहान43 रियल्टी और कैंपियन प्रॉपर्टीज से जुड़ी संपत्तियां शामिल हैं। ईडी का दावा है कि यह कार्रवाई कई हजार करोड़ के बैंक धोखाधड़ी मामले से जुड़ी है, जिसमें समूह की कंपनियों ने बैंकों से लिए गए लोन का दुरुपयोग किया।

कर्ज में डूबा समूह
ईडी की रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2012 के बीच रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) और उसकी सहयोगी कंपनियों ने भारतीय बैंकों से ₹40,000 करोड़ से अधिक के लोन लिए थे, जिनमें से ₹19,694 करोड़ अभी भी बकाया हैं। पांच बैंकों ने इन खातों को 'फ्रॉड' घोषित कर दिया है। जांच एजेंसियों का कहना है कि इस दौरान जुटाई गई रकम को बिज़नेस विस्तार में लगाने के बजाय पुराने कर्ज चुकाने और समूह की अन्य कंपनियों को ट्रांसफर करने में इस्तेमाल किया गया। ईडी का यह भी कहना है कि लगभग ₹13,600 करोड़ रुपये की राशि को कई लेयर्ड ट्रांजेक्शनों के ज़रिए समूह की अलग-अलग कंपनियों में घुमाया गया और कुछ धनराशि विदेश भेजी गई। यह पूरी गतिविधि बैंक लोन की शर्तों के उल्लंघन में की गई बताई जा रही है।

SFIO की जांच से बढ़ी उम्मीदें
अब जब मामला SFIO को सौंपा गया है, तो जांच का दायरा और गहराई दोनों बढ़ गए हैं। SFIO यह पता लगाएगा कि फंड डाइवर्जन का असली जिम्मेदार कौन था और समूह के शीर्ष प्रबंधन की इसमें क्या भूमिका रही। सरकारी सूत्रों का कहना है कि अगर आरोप साबित होते हैं, तो कंपनी एक्ट की धारा 447 (कॉर्पोरेट धोखाधड़ी) के तहत कड़ी सज़ा और आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

 

What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry