नईदिल्ली
भारत ने बांग्लादेश के साथ अपनी संवेदनशील और लंबी सीमा पर सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। भारत ने शुक्रवार को तीन नई सैन्य छावनियों (गैरीसन) का उद्घाटन किया है। ये छावनियां असम के धुबरी के पास बामुनी, बिहार के किशनगंज, और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में स्थित हैं। ये तीनों गढ़ अब पूरी तरह से ऑपरेशनल हैं। इन्हें भारतीय सेना व सीमा सुरक्षा बल (BSF) के लिए फोर्स मल्टीप्लायर यानी शक्ति में बढ़ोत्तरी माना जा रहा है।
इन नई छावनियों का उद्देश्य 4096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा में मौजूद रणनीतिक कमजोरियों को दूर करना और किसी भी संभावित घुसपैठ या आपात स्थिति में तेजी से जवाब देने की क्षमता बढ़ाना है।
चिकन नेक पर नजर
इस कदम का एक अहम भू-राजनीतिक पहलू भी है। उत्तर बंगाल का सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की पूर्वोत्तर दिशा में एकमात्र जमीनी कड़ी है। इसे सामरिक हलकों में चिकन नेक कहा जाता है। मात्र 22 किलोमीटर चौड़ी यह पट्टी देश के आठ पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि भारत से जोड़ती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कभी यह कॉरिडोर दुश्मन के निशाने पर आया, तो भारत के 4.5 करोड़ से अधिक नागरिकों वाले पूरे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पर संकट मंडरा सकता है। इसीलिए नई छावनियों का निर्माण भारतीय सैन्य लॉजिस्टिक और आर्थिक संपर्क को सुरक्षित रखने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
नई दिल्ली की रणनीतिक तैयारी
रक्षा सूत्रों के अनुसार, इन छावनियों के साथ भारत ने सीमा पर आधुनिक उपकरणों, सड़क नेटवर्क और निगरानी प्रणालियों की तैनाती भी बढ़ा दी है। यह सब भारत की बॉर्डर मॉडर्नाइजेशन ड्राइव के तहत किया जा रहा है। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने कहा कि नई छावनियां न केवल हमारी तैनाती को मजबूत करेंगी बल्कि घुसपैठ या बाहरी गतिविधियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने में भी मददगार होंगी।
ढाका-रावलपिंडी समीकरण पर नजर
इस सामरिक सुदृढ़ीकरण की टाइमिंग भी बेहद अहम मानी जा रही है। कुछ ही हफ्ते पहले, बांग्लादेश के अंतरिम मुख्य सलाहकार प्रो. मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारियों की मेजबानी की थी। पाकिस्तान के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जनरल साहिर शामशाद मिर्जा ने ढाका पहुंचकर यूनुस से उनके जमुना निवास पर मुलाकात की। दोनों के बीच क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा हुई। हालांकि, भारतीय सुरक्षा हलकों में इस मुलाकात को सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता से कहीं अधिक माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, ढाका और रावलपिंडी के बीच ऐसे और संवाद आने वाले हफ्तों में जारी रह सकते हैं, जिससे दिल्ली की सतर्कता और बढ़ गई है।
भविष्य की तैयारी
भारत की ओर से सीमा पर नए गढ़ों का निर्माण न केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम स्पष्ट करता है कि भारत अपने पूर्वी मोर्चे पर किसी भी भू-राजनीतिक अस्थिरता या पड़ोसी देशों के बदलते समीकरणों को लेकर चुपचाप लेकिन सख्त तैयारी में जुटा हुआ है।
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