गुलदस्ता छोड़ो, फलों की टोकरी दो! — धर्मेंद्र प्रधान ने 500 रुपये की गुलदस्ता संस्कृति को किया चुनौती

मध्य प्रदेश राज्य

 भोपाल
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भोपाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुए. इस दौरान उन्होंने शिक्षा की जन-आंदोलन की बात करते हुए मध्य प्रदेश के स्कूली बच्चों के पोषण को लेकर एक चौंकाने वाला बयान दिया और मंच पर मौजूद बीजेपी विधायकों को सख्त नसीहत भी दी. 

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पोषण का अभियान चलाया है, लेकिन यह केवल सरकारी मिशन नहीं हो सकता. उन्होंने जनप्रतिनिधियों से अपील की कि वे गुलदस्ते पर खर्च होने वाले 500 या 1000 रुपए को भी फल या पोषण सामग्री पर खर्च करें. 

प्रधान ने कहा, ''मुझे स्वागत के दौरान गुलदस्ता भेंट किया जाता है, जिसकी कीमत कम से कम 500 रुपए होती और वह महज 20 सेकंड के लिए ही होता है. फोटो खिंचवाने के लिए गुलदस्ते भेंट किए जाते हैं, जबकि इतने पैसों में 2 किलो सेब आ जाएंगे.''

उन्होंने गुजरात का उदाहरण दिया कि वहां गुलदस्तों की जगह फलों की टोकरी देने की पहल शुरू की गई. केंद्रीय मंत्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा को जन-आंदोलन बनाने के लिए केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं हैं, बल्कि समाज को भी आगे आना होगा. इस दौरान उन्होंने मध्य प्रदेश के बच्चों की पोषण स्थिति पर चिंता व्यक्त की. 

बच्चों के पोषण की बात करते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने मंच पर मौजूद बीजेपी विधायकों रामेश्वर शर्मा और भगवानदास सबनानी को टोकते हुए एक रचनात्मक सुझाव दिया. कहा, ''ये हमारे मित्र रामेश्वर शर्मा बडे़-बडे़ भंडारे करते हैं. हमारे हिंदू नेता हैं. मैं उनसे निवेदन करता हूं कि इस बार रामेश्वर जी की विधानसभा में कम से कम हफ्ते में एक बार एक बच्चे को एक पीस अंजीर, दो काजू और एक बेसन का लड्‌डू मिल जाए. शायद उसके न्यूट्रिशनल इंपैक्ट से कोई अब्दुल कलाम निकल सकता है. ये तो समाज का दायित्व है. प्रधानमंत्री जी ने पोषण का अभियान चलाया है लेकिन ये सरकारी मिशन नहीं हो सकता. सरकार तो कर ही रही है.''

धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, "मैं जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि मध्य प्रदेश के डेढ़ करोड़ विद्यार्थियों में से 50 लाख बच्चे ऐसे होंगे जिन्होंने 5वीं क्लास तक सेब (Apple) नहीं देखा होगा. देखे होंगे तो बाजार में देखे होंगे, खाने का उनको सौभाग्य नहीं है. अंजीर तो उनकी जिंदगी में शायद 10वीं के बाद आया तो आया, नहीं तो नहीं. उन्होंने यह भी कहा कि अनेक बच्चों को एक गिलास दूध जब चाहिए तब नहीं मिलता है.''

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