केरल निकाय चुनाव में बीजेपी का चौंकाने वाला रिजल्ट, कांग्रेस और लेफ्ट को मिली कड़ी टक्कर

देश

तिरुवनंतपुरम

केरल में सत्ता का सेमिफाइनल माने जा रहे अहम स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे अब काफी हद तक साफ हो गए हैं. राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया है. वहीं सत्ताधारी सीपीएम नीत एलडीएफ को इन चुनावों में झटका लगा है. वहीं इन निकाय चुनावों में बीजेपी ने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया है. भगवा दल ने तिरुवनंतपुरम सहित कई जिला पंचायतों में जीत दर्ज की है.

केरल के 6 नगर निगम, 14 जिला पंचायत, 87 नगर पालिका, 152 ब्लॉक पंचायत और 941 ग्राम पंचायत के लिए चुनाव हुए थे. राज्य के 244 केंद्रों और 14 जिला कलेक्ट्रेट में वोटों की गिनती चल रही है. यहां सभी की नजरें इन नतीजों पर हैं, क्योंकि इससे 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जनता का रुझान पता चलेगा.

स्थानीय निकाय चुनाव इस बार केवल सीटों की गणित तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने राज्य की राजनीति में कुछ ऐसे मुद्दों को भी केंद्र में ला दिया, जो आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा तय कर सकते हैं. लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) का परंपरागत दबदबा बरकरार है, कांग्रेस भी कई इलाकों में मजबूती से लड़ती दिखी, लेकिन बीजेपी के लिए यह चुनाव खास तौर पर अहम माना जा रहा है.

इसकी सबसे बड़ी वजह है एर्नाकुलम जिले का मुनंबम इलाका, जहां NDA की जीत को बीजेपी एक "राजनीतिक और सामाजिक टर्निंग पॉइंट" के रूप में पेश कर रही है. बीजेपी के केरल महासचिव अनूप एंटनी जोसेफ ने मुनंबम वार्ड में NDA की जीत को "ऐतिहासिक" बताया है.

बीजेपी नेता का दावा है कि मुनंबम में करीब 500 ईसाई परिवार वक्फ बोर्ड के कथित अवैध दावों की वजह से अपने घरों से बेदखली के खतरे का सामना कर रहे थे. अनूप एंटनी के मुताबिक, मोदी सरकार और बीजेपी ने इस मुद्दे पर खुलकर इन परिवारों का साथ दिया, उसी का नतीजा है कि लोगों ने स्थानीय चुनाव में बीजेपी को अपना समर्थन दिया.

सात दशक पुराना है वक्फ विवाद की जड़

मुनंबम वक्फ विवाद की जड़ें आज से करीब सात दशक पुरानी हैं. 1950 में सिद्दीकी सैत नामक व्यक्ति ने यह जमीन फरीद कॉलेज को दान की थी. इसके बाद कॉलेज प्रशासन ने इस भूमि के कुछ हिस्से स्थानीय निवासियों को बेच दिए, जबकि इन इलाकों में लोग पहले से रह रहे थे. साल 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस पूरी जमीन को वक्फ संपत्ति के तौर पर रजिस्टर कर दिया, जिससे पहले हुए सभी सौदे अमान्य माने जाने लगे. इसके बाद सैकड़ों परिवारों के सामने बेदखली का संकट खड़ा हो गया.

410 परिवारों के बेदखली का डर

इस फैसले के खिलाफ मुनंबम और चेराई इलाकों में 410 दिनों से भी ज्यादा समय तक आंदोलन चला. प्रभावित परिवारों ने कोझिकोड वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, वहीं राज्य सरकार ने जमीन के स्वामित्व की जांच के लिए सीएन रामचंद्रन नायर आयोग का गठन किया. 2025 में केरल हाई कोर्ट के एकल पीठ ने इस आयोग को रद्द कर दिया था, लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने आयोग को बहाल करते हुए 2019 के वक्फ रजिस्ट्रेशन को "कानून के अनुरूप नहीं" बताया.

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक

 रिपोर्ट के मुताबिक, 12 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के "नॉट वक्फ" वाले फैसले पर रोक लगा दी और जनवरी 2026 तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. इससे फिलहाल किसी भी परिवार की बेदखली पर रोक है. मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी पहले ही भरोसा दिला चुके हैं कि किसी को जबरन नहीं हटाया जाएगा.

मुनंबम की जीत को ईसाई समर्थन का संकेत मान रही बीजेपी

बीजेपी अब इस पूरे विवाद को "न्याय बनाम अन्याय" की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है. मुनंबम में मिली जीत को पार्टी केरल में ईसाई समुदाय के बीच बढ़ते भरोसे का संकेत मान रही है. मसलन, भले ही यह जीत प्रतीकात्मक हो, लेकिन वक्फ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बीजेपी की आक्रामक राजनीति आने वाले समय में राज्य की चुनावी बहस को और तेज कर सकती है.

 

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