चंडीगढ़.
सुप्रीम कोर्ट की ओर से रिटायर्ड जस्टिस नवाब सिंह की अगुवाई में गठित कमेटी से मिलने पहुंचे किसान नेताओं ने फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अपनी विस्तृत राय रखी। इस दौरान स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने वाले सतनाम सिंह बेहरू ने समिति के सदस्यों के सामने भावुक अपील की।
सतनाम बेहरू ने कहा कि वह न्यायालय के समय का महत्व समझते हैं, इसलिए अपनी बात संक्षेप में ही रखेंगे। उन्होंने कहा कि यदि किसानों की बातों पर संदेह हो, तो कम से कम खेती के क्षेत्र के विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की राय अवश्य सुनी जानी चाहिए। उन्होंने उल्लेख किया कि वह स्वयं पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन समिति के सदस्य तथ्य और तर्क के आधार पर निर्णय लेने में सक्षम हैं। बेहरू ने बताया कि वह वर्ष 2000 से इस मुद्दे के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उनका कहना था कि किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा, इसलिए सरकार को इस दिशा में नीति बनानी चाहिए। 2004 में केंद्र सरकार ने एम.एस. स्वामीनाथन की अगुवाई में एक राष्ट्रीय कृषि आयोग गठित किया, जिसने दो वर्ष की विस्तृत मेहनत के बाद पांच जिल्दों में अपनी रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट में सिफारिश की गई कि किसानों को उनकी फसल की लागत पर 50 प्रतिशत लाभ लेना चाहिए। लेकिन सरकारों ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में भी लगी बाधाएं
- सतनाम ने कहा कि रिपोर्ट का सार तैयार करने के लिए वह प्रो. रंजीत सिंह घुम्मण के पास पहुंचे, लेकिन पहले उन्हें मना कर दिया गया। उनकी अनेक विनतियों के बाद सार तैयार हुआ और इसी आधार पर 2011 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
- सुप्रीम कोर्ट में मामला कई महीनों तक चला। इस बीच 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी भाषणों में स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की बात कही। बेहरू ने इस वादे को भी अपनी याचिका में शामिल किया, परंतु अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी वादों पर फैसला नहीं दिया जा सकता।
- सतनाम ने समिति को बताया कि यदि खेती नहीं बची तो देश की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। उनकी बातों को सुनकर समिति में मौजूद कई विशेषज्ञ गंभीर होकर उन्हें सुनते दिखाई दिए।
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