चंडीगढ़.
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 40 वर्षों से पार्ट टाइम सफाईकर्मी के रूप में सेवा दे रहे कर्मचारी के साथ हरियाणा सरकार के रवैये पर तीखा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक काम लेने के बाद भी कर्मचारी के नियमितीकरण से इनकार करना संविधान की आत्मा के विरुद्ध है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1986 से लगातार सेवाएं दे रहे करनाल निवासी बीर सिंह उर्फ भीरा को आज भी अस्थायी बनाए रखना राज्य द्वारा किया गया संस्थागत शोषण है, जिसे किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस संदीप मोद्गिल ने कहा कि राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह एक मॉडल एंप्लायर की तरह व्यवहार करे, लेकिन तकनीकी वर्गीकरण का सहारा लेकर दशकों तक श्रम लेने के बाद जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना इस अवधारणा को ही खोखला कर देता है।
अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सेवा लेने के बाद कर्मचारी को अनियमित बनाए रखना न्याय और निष्पक्षता की बुनियादी भावना पर चोट है। अदालत के समक्ष यह भी आया कि याचिकाकर्ता का सेवा रिकार्ड पूरी तरह निष्कलंक रहा है और उसकी ईमानदारी या कार्यकुशलता पर कभी सवाल नहीं उठा। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा किया गया कार्य न तो अस्थायी प्रकृति का है और न ही कभी-कभार किया जाने वाला काम है, बल्कि संस्थान के दैनिक संचालन के लिए अनिवार्य और स्थायी काम वह कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कर्मचारी को वर्षों तक अस्थायी बनाए रखना समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान केवल औपचारिक समानता की बात नहीं करता, बल्कि वह गरिमा, आजीविका और सामाजिक न्याय की ठोस गारंटी देता है।
प्रस्तावना में निहित समाजवादी गणराज्य की भावना तब निरर्थक हो जाती है, जब प्रशासनिक ढांचे के सबसे निचले पायदान पर काम करने वालों को जीवन भर की सेवा के बाद भी सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही याचिकाकर्ता को नाममात्र का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कहा गया हो, लेकिन उसके द्वारा किया श्रम सार्वजनिक संस्थानों के सुचारू संचालन की रीढ़ है।
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