प्रकृति की खुशखबरी: बारनवापारा अभयारण्य में लंबे समय बाद दिखी वन्यजीव गतिविधि

छत्तीसगढ़ रायपुर

 

रायपुर.
 
दुर्लभ ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन-पिजन,बर्ड सर्वे के दौरान हुई विशेष फोटोग्राफी

बारनवापारा अभयारण्य से पक्षी प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए एक बेहद सुखद खबर सामने आई है। हाल ही में अभ्यारण्य में आयोजित बर्ड सर्वे के दौरान दुर्लभ 'ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन-पिजन' (ट्रेरॉन बाइसिंक्टस) की उपस्थिति दर्ज की गई है। 

            ऐतिहासिक रूप से इस पक्षी की उपस्थिति बारनवापारा में पहले भी दर्ज की गई थी, जब वर्ष 2015-16 में विख्यात पक्षी विशेषज्ञ ए.एम.के. भरोस ने इसे देखा था। उसके बाद से यह प्रजाति यहाँ से ओझल रही थी, जिससे अब इसकी पुनः वापसी वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से एक बड़ा रिकॉर्ड मानी जा रही है।

          इस दुर्लभ पक्षी की साइटिंग पकरीद टीम द्वारा की गई, जिसमें बर्डर एवं वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर राजू वर्मा और प्रतीक ठाकुर सहित कर्नाटक, बिहार और ओडिशा के विशेषज्ञ शामिल थे। टीम को उस वक्त बड़ी सफलता मिली जब इस पक्षी का एक जोड़ा उनके ठीक ऊपर पेड़ पर बैठा पाया गया, जिससे उड़ने से पहले उनकी विस्तृत फोटोग्राफी और रिकॉर्डिंग करना संभव हो सका।

          वन्यजीव प्रेमियों के लिए यह साइटिंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस प्रजाति को कई वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इस क्षेत्र में देखा गया है।

         भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में पाया जाने वाला यह पक्षी मुख्य रूप से अंजीर और जंगल के अन्य रसीले फलों पर निर्भर रहता है। इसे एक निवासी प्रजाति माना जाता है जो स्थानीय मौसमी बदलावों के साथ अपनी गतिविधियां संचालित करता है। छत्तीसगढ़ के अन्य वनों में भी इसकी मौजूदगी समय-समय पर दर्ज होती रही है, लेकिन बारनवापारा में इसकी वापसी पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती को दर्शाती है।

            सर्वे टीम ने इस पक्षी की पहचान इसकी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के आधार पर की है। ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन-पिजन की नीली-धूसर गर्दन, पीले-हरे रंग का सिर और शरीर का निचला हिस्सा इसे विशेष बनाता है। इसके लाल पैर और स्लेटी-धूसर केंद्रीय पूंछ के पंख इसे आमतौर पर दिखने वाले 'येलो-फुटेड ग्रीन-पिजन' (हरियल) से स्पष्ट रूप से अलग करते हैं।

           विशेष रूप से नर पक्षी की पहचान उसके सीने पर मौजूद गहरे नारंगी रंग के पैच से की गई। कई वर्षों बाद इस प्रजाति का कैमरे में कैद होना न केवल फोटोग्राफर्स के लिए उत्साह का विषय है बल्कि यह अभयारण्य में पक्षियों के अनुकूल वातावरण और विविधता का एक सशक्त प्रमाण भी है।

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