भारत का ₹26,000 करोड़ का नया प्लान: ब्रह्मोस और राफेल से नहीं, फिर भी चीन-पाक को होगी परेशानी

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बेंगलुरु 

भारत ग्‍लोबल सिक्‍योरिटी कंडीशंस को देखते हुए अपने डिफेंस सिस्‍टम को मजबूत करने के साथ ही उसे कटिंग एज टेक्‍नोलॉजी की मदद से अपडेट करने में जुटा है. खासकर एरियल थ्रेट से निपटने के लिए हजारों-लाखों करोड रुपये का निवेश किया जा रहा है. एक तरफ जहां ब्रह्मोस और 5th जेनरेशन फाइटर जेट पर फोकस किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ एयर डिफेंस सिस्‍टम पर भी गंभीरता से ध्‍यान दिया जा रहा है. अब भारत एक और सेगमेंट में काम कर रहा है. दुश्‍मनों की हर गतिविधि पर बाज से पैनी नजर रखने के लिए स्‍पेस में स्‍पाई सैटेलाइट स्‍थापित करने की योजना पर काम किया जा रहा है. भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को अंतरिक्ष के मोर्चे पर नई ऊंचाइयों तक ले जाने की तैयारी में है. सरकार ने ₹26,000 करोड़ की लागत से 52 अत्याधुनिक सैन्य निगरानी सैटेलाइट का विशाल बेड़ा तैनात करने की योजना बनाई है, जिसे ‘स्पेस-बेस्ड सर्विलांस फेज-III’ प्रोग्राम के तहत 2029 तक पूरा किया जाएगा. यह अब तक का भारत का सबसे बड़ा सैन्य अंतरिक्ष निवेश माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य देश की सीमाओं और समुद्री क्षेत्रों की चौबीसों घंटे निगरानी को मजबूत करना है.

इस सैटेलाइट ग्रुप की सबसे बड़ी विशेषता इसकी नाइट-विजन और ऑल-वेदर निगरानी क्षमता है. इनमें लगे अत्याधुनिक इंफ्रारेड सेंसर रात के अंधेरे, बादलों और खराब मौसम के बावजूद जमीन पर गतिविधियों की स्पष्ट तस्वीर देने में सक्षम होंगे. इससे भारत को पहली बार ऐसी निर्बाध निगरानी मिलेगी, जो दिन-रात और हर मौसम में लगातार जारी रह सकेगी. यह तकनीक खास तौर पर सीमावर्ती इलाकों और समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को नई धार देगी. ‘इंडियन डिफेंस न्‍यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, इन सैटेलाइट्स में इंफ्रारेड सेंसर के साथ-साथ इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे और सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) भी लगाए जाएंगे. यह मल्टी-सेंसर व्यवस्था अलग-अलग परिस्थितियों में हाई क्‍वालिटी की इमेजरी और डेटा उपलब्ध कराएगी. इससे किसी क्षेत्र पर बार-बार नजर रखने का समय अंतराल घटेगा और सेना को ज्यादा तेजी से खुफिया जानकारी मिल सकेगी. सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि कम री-विजिट टाइम का मतलब है कि किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तत्काल प्रतिक्रिया संभव हो सकेगी.
कब लॉन्‍च होगी पहली सैटेलाइट?

योजना के अनुसार, इस बेड़े का पहला उपग्रह अप्रैल 2026 तक लॉन्च किया जाएगा और अगले तीन वर्षों में पूरी प्रणाली तैनात कर दी जाएगी. ये उपग्रह अलग-अलग कक्षाओं में काम करेंगे – लो-अर्थ ऑर्बिट से लेकर जियोस्टेशनरी ऑर्बिट तक. लो-अर्थ ऑर्बिट उपग्रह हाई रेजोल्यूशन और लगातार पास देने में मदद करेंगे, जबकि जियोस्टेशनरी सैटेलाइट संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार नजर बनाए रखेंगे. इस मल्‍टी-लेयर्ड तैनाती से सीमाओं और समुद्री क्षेत्रों में किसी भी तरह के ब्लाइंड स्पॉट की संभावना बेहद कम हो जाएगी. इस महत्वाकांक्षी परियोजना में इसरो 21 उपग्रह विकसित करेगा, जबकि शेष 31 उपग्रह निजी क्षेत्र की कंपनियां बनाएंगी. यह किसी भी भारतीय सैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी होगी. इससे रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ देश के निजी उद्योगों को अत्याधुनिक तकनीक विकसित करने का अवसर मिलेगा. सरकार इसे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों के अनुरूप अहम कदम मान रही है.
हर कदम पर पैनी नजर

एक बार प्रणाली पूरी तरह चालू होने के बाद इसका संचालन और नियंत्रण रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (Defence Space Agency) के पास होगा. इससे सभी उपग्रहों से मिलने वाले डेटा को एकीकृत कर सैन्य अभियानों में तेजी और सटीकता लाई जा सकेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जमीनी बलों, वायुसेना और नौसेना के बीच समन्वय और बेहतर होगा, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी. इस परियोजना की जरूरत हालिया सैन्य अभियानों से सामने आई सीख से जुड़ी है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि आधुनिक युद्ध में उपग्रह आधारित खुफिया जानकारी कितनी निर्णायक भूमिका निभाती है. रियल-टाइम डेटा से दुश्मन की गतिविधियों, सैनिक जमावड़े और हथियारों की तैनाती पर सटीक नजर रखना संभव हुआ. नई उपग्रह प्रणाली इस क्षमता को और मजबूत करेगी. ये सैटेलाइट जमीन पर माइक्रो चेंज की पहचान करने में सक्षम होंगे. जैसे सीमावर्ती इलाकों में नई संरचनाओं का निर्माण, सैनिकों की तैनाती या समुद्र में जहाजों और पनडुब्बियों की आवाजाही. कम समय में मिलने वाले अपडेट्स से कमांडरों को स्थिति की स्पष्ट तस्वीर मिलेगी और वे तेजी से रणनीतिक फैसले ले सकेंगे. इससे भारत की प्रतिरोधक क्षमता (डेटरेंस) भी मजबूत होगी.

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