नई दिल्ली
भारत के गणतंत्र दिवस परेड में पाकिस्तान के मुख्य अतिथि बनने की घटना इतिहास में 2 बार दर्ज है, जो दोनों देशों के बीच उस समय के कूटनीतिक प्रयासों को दर्शाती है। पहली बार जनवरी 1955 में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल सर मलिक गुलाम मुहम्मद मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। यह वह साल था जब परेड राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर आयोजित की गई थी। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें आमंत्रित किया था, ताकि 1947 के विभाजन और कश्मीर युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम हो सके और सुलह की कोशिश की जा सके।
गुलाम मुहम्मद पूर्व भारतीय सिविल सेवा अधिकारी थे, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने 1946 में नाइट की उपाधि दी थी। पाकिस्तान में उन्होंने प्रधानमंत्री ख्वाजा नाजिमुद्दीन की सरकार बर्खास्त की और संविधान सभा को भंग कर दिया था, जिससे वहां संवैधानिक व्यवस्था कमजोर हुई। फिर भी भारत ने इस निमंत्रण को प्रतीकात्मक कदम माना। इसके 10 साल बाद, जनवरी 1965 में पाकिस्तान के खाद्य एवं कृषि मंत्री राणा अब्दुल हमीद मुख्य अतिथि बने। यह निमंत्रण लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री काल में दिया गया था। राना अब्दुल हमीद सिंध के प्रभावशाली राणा परिवार से थे, जिनकी जड़ें हिंदू सोडा राजपूतों से जुड़ी थीं। उस समय दोनों देश सैन्य क्षमता का आकलन कर रहे थे और संबंध सुधारने की कोशिशें हो रही थीं।
निमंत्रण के बावजूद कराई घुसपैठ, छिड़ी बहस
भारत ने इसे विश्वास बहाली का माध्यम माना, लेकिन कुछ महीनों बाद अप्रैल 1965 में पाकिस्तान ने रण ऑफ कच्छ में ऑपरेशन डेजर्ट हॉक शुरू कर सीमा पर घुसपैठ की। ब्रिटेन की मध्यस्थता से जून में युद्धविराम हुआ, लेकिन अगस्त में ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में घुसपैठिए भेजे, जिससे सितंबर 1965 में युद्ध छिड़ गया। ऐसे में इन निमंत्रणों पर भारत में बहस हुई। कांग्रेस नेता बी.जी. खेर ने इसे बातचीत का सॉफ्ट ब्रिज बताया, जबकि सी. राजगोपालाचारी जैसे लोगों ने सावधानी बरतने की सलाह दी। कुछ का मानना था कि इससे भारत की संप्रभुता पर असर पड़ सकता है। समाचार पत्रों ने इसे शिष्टाचार का कदम माना, लेकिन जनता में सीमा विवादों को लेकर चिंता थी। ये घटनाएं उस दौर की हैं जब दोनों देशों के बीच प्रतीकात्मक कदम संघर्ष रोकने की कोशिश थे।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
