जैनदर्शन विभाग में आचार्य कुंदकुंद जयंती का आयोजन

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नई दिल्ली
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के जैनदर्शन विभाग द्वारा वसंत पंचमी पर्व के शुभ अवसर पर आचार्य कुंदकुंद जयंती का आयोजन श्रद्धा एवं विद्वत्तापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ।         

इस अवसर पर जैनदर्शन की दार्शनिक परंपरा और आचार्य कुंदकुंद के योगदान पर सारगर्भित चर्चा की गई। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए प्रो. अनेकांत कुमार जैन जी ने कहा कि आचार्य कुन्दकुन्द भारतीय ज्ञान परंपरा के स्तंभ थे ।  उनकी कृतियों में ज्ञान की वह क्रांति थी कि अनेक लोग जिन्होंने उनका स्वाध्याय किया , इस परंपरा में दीक्षित हो गए ।       मंगलाचरण का सस्वर पाठ शोधार्थी श्रुति जैन एवं अंजलि जैन ने किया,जिसमें उन्होंने आचार्य कुन्दकुन्द के सभी ग्रंथों के मंगलाचरण का एक गुलदस्ता प्रस्तुत किया । जिससे कार्यक्रम का शुभारंभ आध्यात्मिक वातावरण में हुआ।

मुख्य वक्ता के रूप में देश-विदेश में सुविख्यात विद्वान तथा जैनदर्शन के वरिष्ठ मनीषी विभागाध्यक्ष प्रो. वीर सागर जैन जी ने आचार्य कुंदकुंद के अमूल्य योगदान पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने आचार्य कुंदकुंद को जैन दर्शन का आधार-स्तंभ बताते हुए कहा कि उन्होंने ने जैन दर्शन के मूल तत्वज्ञान की रक्षा की और आत्मा-केंद्रित दर्शन को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। एक शिलालेख में उल्लेख मिलता है कि कुंदकुंदाचार्य वर्धमान चारित्र के धनी थे और वहीं से पञ्चम स्वर्ग में लौकान्तिक देव के रूप में उत्पन्न हुए। उन्होंने यह भी बताया कि आचार्य कुंदकुंद साक्षात विदेह क्षेत्र गए थे, जहाँ उन्होंने उस समय विद्यमान तीर्थंकरों के दर्शन किए, और सात दिन वहाँ निवास किया तथा समवसरण में उनके प्रवचन सुने, यह प्रसंग उनके उच्च आध्यात्मिक स्तर और तपस्वी जीवन का प्रमाण है।

समयसार ग्रंथ पर उन्होंने गहन चर्चा करते हुए उसकी गाथा 3 और गाथा 320 का सार प्रस्तुत किया ।कार्यक्रम के समापन पर धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी ज़ेबा अफ़रीन द्वारा किया गया। उन्होंने संक्षिप्त एवं प्रभावपूर्ण शब्दों में शिक्षकगण एवं सभी उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर आचार्य कुन्दकुन्द आधारित क्विज का संचालन शोधार्थी श्रुति जैन ने किया । वसंत पंचमी के इस पावन अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम जैन दर्शन की ज्ञान-परंपरा को सजीव करता हुआ विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण को और अधिक सुदृढ़ बनाने वाला सिद्ध हुआ।

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