सिर्फ 325 रुपये कमाने का दावा पड़ा भारी, सुप्रीम कोर्ट ने पति को दिए 10 हजार रुपये मेंटेनेंस देने के निर्देश

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नई दिल्ली
पति की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने फिर कहा कि तो तुम अपनी पत्नी को साथ रख लो। वह तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के लिए खाना बनाएगी। इस पर पति के वकील ने कहा कि उसने मेरे माता-पिता के खिलाफ भी शिकायत की है। सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक मैनटेनेंस से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान पति ने कोर्ट को बताया कि वह सिर्फ रोजाना 325 रुपये ही कमाता है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया कि ऐसा हो ही नहीं सकता। हम हर महीने दस हजार रुपये मैनेंटेंस देने का ऑर्डर देंगे। अदालती सुनवाइयों को कवर करने वाली वेबसाइट बार एंड बेंच के अनुसार, इस पर पति के वकील ने कहा कि वह इसे अफॉर्ड नहीं कर सकता। मेरे ऑफिस के सहयोगी एफिडेविट फाइल करने के लिए तैयार हैं। यही वह रकम है, जो मैं कमाता हूं।

पति की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने फिर कहा कि तो तुम अपनी पत्नी को साथ रख लो। वह तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के लिए खाना बनाएगी। इस पर पति के वकील ने कहा कि उसने मेरे माता-पिता के खिलाफ भी शिकायत की है। मुझे नहीं पता कि शादी चलेगी या नहीं। कोर्ट ने इसके बाद कहा कि हम कंपनी को बुलाएंगे। (जो बहुत कम पेमेंट कर रही है।) उन्हें एफिडेविट फाइल करने दो। इस पर पति के वकील ने भी सहमति जता दी और कहा कि हां, यह तो दूसरे कर्मचारियों के लिए भी बेहतर होगा। मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने आखिर में ऑर्डर रिजर्व कर लिया।

वहीं, पिछले दिनों शादी के झगड़े में मेंटेनेंस देने से जुड़े एक अन्य मामले पर सुनवाई करते हुए, दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि यह मानना ​​कि कमाने वाला जीवनसाथी बेकार है, घरेलू मदद की गलतफहमी दिखाता है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 16 फरवरी को दिए गए एक डिटेल्ड फैसले में पत्नी की अर्जी मान ली और घरेलू हिंसा से महिलाओं के प्रोटेक्शन एक्ट (PWDV Act) के तहत मजिस्ट्रेट और अपील कोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें उसे अंतरिम मेंटेनेंस देने से मना कर दिया गया था। पति की तरफ से इस दलील पर कि पत्नी बेकार बैठकर मेंटेनेंस का दावा नहीं कर सकती, कोर्ट ने कहा कि एक होममेकर बेकार नहीं बैठती, बल्कि ऐसा काम करती है जिससे कमाने वाला जीवनसाथी अच्छे से काम कर सके।

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