जयपुर
राजस्थान की राजधानी जयपुर लोक एवं प्रदर्शन आधारित कलाओं का प्रमुख केंद्र रही है। ग्रामीण अंचलों में जन्मी अनेक लोक कलाएं यहां संरक्षण और निरंतर मंचन के कारण परिष्कृत रूप में विकसित हुईं। पर्यटन नगरी होने के कारण बड़ी संख्या में लोक कलाकार यहां आकर बसे, जो देश-विदेश से आने वाले सैलानियों के सामने अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। कालबेलिया और घूमर जैसे लोकनृत्य भी इसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
इन्हीं परंपराओं के बीच जयपुर तमाशा, जिसे जयपुरी ख्याल भी कहा जाता है, एक विशिष्ट लोकनाट्य विधा के रूप में पहचाना जाता है। शास्त्रीय, अर्धशास्त्रीय और लोक संगीत के संगम से सजी यह रंगशैली अभिनय, गायन और नृत्य का प्रभावशाली संयोजन प्रस्तुत करती है। पिछले लगभग 250 वर्षों से इसका मंचन ब्रह्मपुरी स्थित खुले रंगमंच ‘अखाड़ा’ में किया जा रहा है। परंपरागत रूप से होली, अमावस्या और रामनवमी जैसे अवसरों पर इसका विशेष आयोजन होता है।
18वीं सदी से चली आ रही परंपरा
तमाशा की शुरुआत 18वीं शताब्दी में आगरा के आसपास काव्यात्मक संवाद शैली के रूप में हुई। बाद में तत्कालीन शासक सवाई जसवंत सिंह कलाकारों को जयपुर लेकर आए और उन्हें ब्रह्मपुरी में बसाया। यहां भट्ट परिवार के बंशीधर भट्ट के संरक्षण में इस कला ने अपना विशिष्ट स्वरूप ग्रहण किया। तमाशा की कथाएं प्रेम, सामाजिक समरसता और धार्मिक सह-अस्तित्व के संदेश पर आधारित होती हैं। ‘हीर-रांझा’ और ‘लैला-मजनूं’ जैसी अमर प्रेम गाथाओं के साथ-साथ ‘तमाशा गोपीचंद’, ‘जोगी जोगन’, ‘रूपचंद गांधी’, ‘जुत्थान मियां’ और ‘छैला पनिहारी’ जैसी प्रस्तुतियां भी मंचित की जाती हैं। इन रचनाओं को भूपाली, आसावरी, जौनपुरी, मालकौंस, दरबारी, बिहाग, सिंध काफ़ी, भैरवी, कलिंगड़ा और केदार जैसे रागों में प्रस्तुत किया जाता है, जो इसकी संगीतात्मक गरिमा को और समृद्ध बनाते हैं।
सौहार्द और समरसता का संदेश
तमाशा की कहानियों में सामाजिक एकता का संदेश प्रमुखता से उभरता है। ‘रांझा-हीर’ कथा में नायक रांझा प्रेम की प्राप्ति के लिए अजमेर शरीफ दरगाह स्थित सूफी संत मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आशीर्वाद लेने जाता है। यह प्रसंग सांप्रदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक माना जाता है।
विशिष्ट वेशभूषा और रंगशैली
तमाशा की वेशभूषा इसकी अलग पहचान है। कलंगी, गोतेदार भगवस्त्र, सिंगी और सेली जैसे पारंपरिक आभूषण मंचन को आकर्षक बनाते हैं। कई बार कलाकार काल्पनिक वेशभूषा और दृश्यावली का वर्णन भी संवादों के माध्यम से करते हैं, जिससे दर्शकों की कल्पना शक्ति सक्रिय होती है और प्रस्तुति का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
बदलते समय के साथ तालमेल
करीब ढाई सौ वर्षों में इसकी मूल संरचना भले ही सुरक्षित रही हो, लेकिन कहानी कहने की शैली में समय के साथ परिवर्तन आया है। आधुनिक तकनीक, प्रकाश व्यवस्था और समसामयिक घटनाओं के संदर्भ भी अब मंचन में शामिल किए जाने लगे हैं। यही कारण है कि जयपुर तमाशा आज भी जीवंत, प्रासंगिक और दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है। होली जैसे उत्सवों पर जब परकोटे में यह मंचन होता है, तो हीर-रांझा और लैला-मजनूं की प्रेम गाथाएं एक बार फिर जयपुर की सांस्कृतिक धरोहर को सजीव कर देती हैं।
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