खेती-किराना और महुआ व्यापार से बनीं आत्मनिर्भर

छत्तीसगढ़ रायपुर

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खेती-किराना और महुआ व्यापार से बनीं आत्मनिर्भर

बीजापुर जिले से लगभग 15 किलोमीटर दूर नियद नेल्ला नार क्षेत्र के ग्राम चेरपाल की रहने वाली सुनीता दीदी आज आत्मनिर्भरता की एक प्रेरणादायक मिसाल बन गई हैं। कभी एक साधारण गृहिणी के रूप में जीवन जीने वाली सुनीता दीदी ने स्व-सहायता समूह से जुड़कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया और आज वे गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन गई हैं।

पहले सुनीता दीदी  के परिवार की आय केवल खेती और एक छोटी किराना दुकान पर निर्भर थी। खेती मौसम पर आधारित होने के कारण आय स्थिर नहीं रहती थी। इससे बच्चों की पढ़ाई और घर की आवश्यक जरूरतों को पूरा करना भी कठिन हो जाता था। इसी दौरान सुनीता दीदी ने गांव के स्व-सहायता समूह से जुड़ने का निर्णय लिया। समूह की बैठकों में उन्हें बचत, ऋण और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाओं की जानकारी मिली।

समूह के माध्यम से सुनीता दीदी नियमित बचत करने के बाद उन्हें आरएफ से 1,500 रूपए, सीआईएफ से 50 हजार रूपए और बैंक लिंकेज से 30 हजार रूपए का ऋण मिला। इस आर्थिक सहायता से उन्होंने अपनी आय बढ़ाने के लिए कई छोटे-छोटे कार्य शुरू किए। सबसे पहले उन्होंने खेती को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया। उन्नत बीज, जैविक खाद और आधुनिक खेती तकनीकों का उपयोग कर उन्होंने उत्पादन बढ़ाया। इससे उन्हें फसल और सब्जियों से सालाना लगभग 52 हजार से 55 हजार रूपए की आय होने लगी।

इसके बाद उन्होंने अपने घर के पास की छोटी किराना दुकान को व्यवस्थित तरीके से चलाना शुरू किया। गांव के लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का सामान उपलब्ध कराने से दुकान अच्छी चलने लगी और इससे उन्हें सालाना लगभग 45 हजार से 50 हजार रूपए की आय मिलने लगी। इसके साथ ही सुनीता दीदी ने गांव में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए महुआ, टोरा सहित अन्य वनोपज का क्रय-विक्रय भी शुरू किया। वे ग्रामीणों से महुआ और टोरा खरीदकर उसे साफ-सफाई के साथ सुरक्षित रखती हैं और बाजार में अच्छे दामों पर बेचती हैं। इससे उन्हें सालाना लगभग 15 हजार से 20 हजार रूपए का अतिरिक्त लाभ मिलने लगा।

खेती, किराना दुकान और वनोपज व्यापार से उनकी आय लगातार बढ़ती गई। मेहनत, सही योजना और स्व-सहायता समूह के सहयोग से सुनीता दीदी की वार्षिक आय अब लगभग 1 लाख 20 हजार रूपए से अधिक हो गई है। आज सुनीता दीदी अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बना चुकी हैं। साथ ही वे गांव की अन्य महिलाओं को भी स्व-सहायता समूह से जुड़कर स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनकी सफलता यह साबित करती है कि सरकारी योजनाओं और स्व-सहायता समूहों के सहयोग से महिलाएं आत्मनिर्भर बनकर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।

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