पाकिस्तान में शिया-सुन्नी संघर्ष का खतरा? मुनीर की सांसें फूलीं, उलेमाओं से मिले

दुनिया

इस्लामबाद 

ईरान-इजरायल युद्ध के बीच पाकिस्तान में शिया-सुन्नी तनाव की आग भड़कने की आशंका बढ़ गई है। ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर शिया विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी थी, जिसने देश के अंदर सांप्रदायिक संतुलन को हिला दिया है। इस संवेदनशील स्थिति में पाकिस्तान के आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने शिया उलेमाओं से मुलाकात की, लेकिन यह बैठक विवादों में घिर गई।

रमजान के दौरान इफ्तार के मौके पर रावलपिंडी में हुई इस बैठक में मुनीर ने कथित तौर पर शिया धर्मगुरुओं से कहा कि अगर उन्हें ईरान से इतनी मोहब्बत है, तो वे ईरान चले जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि 'कायदे आजम जिन्ना खुद शिया थे', लेकिन उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि किसी दूसरे देश की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा या अशांति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, शिया समुदाय के कुछ नेताओं और सोशल मीडिया पर इस बयान को अपमानजनक बताया जा रहा है। कई रिपोर्टों में दावा किया गया कि मुनीर ने बैठक में एकतरफा मॉनोलॉग दिया, उलेमाओं को बोलने का मौका नहीं दिया और अचानक चले गए। इससे शिया समुदाय में रोष बढ़ा है और कुछ धार्मिक नेताओं ने इसे एंटी-शिया एजेंडा करार दिया है।

बेहद मुश्किल कूटनीतिक राह पर पाकिस्तान
पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका में जारी जंग के बीच पाकिस्तान एक बेहद मुश्किल कूटनीतिक राह पर चल रहा है। सऊदी अरब के साथ गहरे रणनीतिक व रक्षा संबंध, पुरानी भू-राजनीतिक वफादारी और आर्थिक निर्भरता के कारण पाकिस्तान पर यह बाहरी दबाव है कि अगर युद्ध और भीषण होता है तो वह अपने पारंपरिक खाड़ी सहयोगी का समर्थन करे। वहीं दूसरी ओर, देश की आंतरिक सांप्रदायिक संवेदनशीलता और घरेलू सुरक्षा चिंताओं के कारण किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन करना जोखिम भरा हो गया है। इसी वजह से पाकिस्तान सतर्क तटस्थता की नीति अपनाने को मजबूर है, जिसे बनाए रखना अब उसके लिए कठिन होता जा रहा है। इन तमाम दबावों और दुविधाओं की झलक पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की हालिया टिप्पणियों में स्पष्ट रूप से देखने को मिली है।

शिया उलेमाओं के साथ सेना प्रमुख की बैठक
जनरल असीम मुनीर ने हाल ही में अहल-ए-तशीह (शिया) समुदाय के धार्मिक विद्वानों और उलेमाओं से मुलाकात की। इस बातचीत का मुख्य फोकस राष्ट्रीय एकता, सांप्रदायिक सौहार्द और बढ़ती क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के बीच पाकिस्तान के कूटनीतिक रुख पर था। इस दौरान मुनीर का मुख्य संदेश बिल्कुल स्पष्ट था- सबसे पहले तो पाकिस्तान है।

'हम पहले मुसलमान और पाकिस्तानी हैं, फिर शिया-सुन्नी'
ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष को लेकर शिया समुदाय की चिंताओं को संबोधित करते हुए, जनरल मुनीर ने इससे जुड़ी भावनात्मक और धार्मिक संवेदनाओं को स्वीकार किया। लेकिन, उन्होंने धार्मिक नेताओं से राष्ट्रीय स्थिरता को सर्वोपरि रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा- हम पहले मुसलमान और पाकिस्तानी हैं; उसके बाद शिया या सुन्नी। उनका संदेश था कि सांप्रदायिक पहचान को राष्ट्रीय हितों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। मुनीर ने पाकिस्तान की डेमोग्राफी का जिक्र करते हुए कहा कि भले ही देश में सुन्नी बहुसंख्यक हैं, लेकिन आबादी का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा शिया है। उलेमाओं से बात करते हुए उन्होंने कहा- मैं शिया समुदाय की भावनाओं को समझता हूं, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि विदेशों में हो रहे घटनाक्रमों का गुस्सा पाकिस्तान में घरेलू अशांति में नहीं बदलना चाहिए।

आम पाकिस्तानी को क्यों भुगतना चाहिए?
सेना प्रमुख ने सख्त चेतावनी दी कि पाकिस्तान अपनी सीमाओं के बाहर के संघर्षों के कारण होने वाली आंतरिक अस्थिरता को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा- पाकिस्तान अन्य देशों के मुद्दों, नीतियों और संघर्षों के कारण होने वाले दंगों का बोझ नहीं उठा सकता। एक आम पाकिस्तानी को इसका खामियाजा क्यों भुगतना चाहिए? उन्होंने कहा कि धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने सभी संप्रदायों के मौलवियों और उलेमाओं से एकता, सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकजुटता को बढ़ावा देने तथा आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में रचनात्मक और सकारात्मक भूमिका निभाने की अपील की।

सऊदी अरब के साथ रणनीतिक संबंधों की पुष्टि
एक तरफ जहां उन्होंने देश के भीतर शांति की अपील की, वहीं दूसरी तरफ सेना प्रमुख ने सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने दोनों देशों को करीबी रक्षा साझेदार बताया, जो पुराने सुरक्षा सहयोग और आपसी प्रतिबद्धताओं से बंधे हुए हैं। मुनीर ने मक्का और मदीना में इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों (हरमैन शरीफैन) के 'रक्षक' के रूप में इस्लामाबाद की भूमिका का भी जिक्र किया। यह बयान पाकिस्तान की रणनीतिक सोच में सऊदी अरब के साथ रिश्ते के धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्व को दर्शाता है।

पाकिस्तान की दोहरी चुनौती
सेना प्रमुख का यह दोहरा संदेश इस्लामाबाद की मौजूदा दुविधा को सटीक रूप से दर्शाता है।

बाहरी दबाव: सैन्य साझेदारी, वित्तीय निर्भरता और खाड़ी देशों (विशेषकर सऊदी अरब) की उम्मीदें।

आंतरिक कमजोरियां: सांप्रदायिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती, राजनीतिक अस्थिरता, और किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष में एक पक्ष लेने पर देश में सांप्रदायिक दंगे भड़कने का सीधा जोखिम।

जनरल मुनीर की इन बातों से यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान अपने कूटनीतिक विकल्पों को खुला रखते हुए देश में किसी भी तरह की घरेलू अशांति को पहले ही रोकने की कोशिश कर रहा है। देश के भीतर एकता और संयम की अपील करके और विदेशी मंच पर रणनीतिक संबंधों की पुष्टि करके, पाकिस्तान खुद को बहुत ही सावधानी से स्थापित कर रहा है। 

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