PWD को फटकार, 30 दिन में बहू को नियुक्ति देने का कोर्ट का निर्देश

राज्य

जयपुर

राजस्थान में अब अनुकंपा नियुक्ति को लेकर 'बहू और बेटी' के बीच का कानूनी फर्क खत्म हो गया है. हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट कर दिया कि ससुर की मौत के बाद उनकी बहू भी उतनी ही हकदार है, जितनी एक बेटी होती है. जस्टिस रवि चिरानियां की एकल पीठ ने सुंदरी देवी की याचिका पर फैसला सुनाते हुए विभाग की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जो बहू को परिवार का हिस्सा मानने से कतरा रही थीं. कोर्ट ने पीडब्ल्यूडी (PWD) विभाग की सुस्ती और आपत्तियों पर सख्त नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि बहू को नौकरी से रोकना कानून की मूल भावना के खिलाफ है.

डिवीजन बेंच के फैसले का दिया हवाला
सुनवाई के समय अदालत ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली को आइना दिखाया. कोर्ट ने याद दिलाया कि साल 2023 में ही डिवीजन बेंच यह तय कर चुकी है कि बहू को बेटी के समान ही माना जाए. जब कानूनी रूप से बहू अनुकंपा नियुक्ति के लिए पूरी तरह योग्य है, तो विभाग का तकनीकी अड़ंगे लगाना समझ से परे है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब न्यायपालिका पहले ही इस मुद्दे पर स्थिति साफ कर चुकी है, तो प्रशासन को इसमें नई आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं है.

बेटे की बीमारी और मौत ने बढ़ाई मुश्किलें
इस मामले के पीछे एक परिवार के संघर्ष की लंबी कहानी है. याचिकाकर्ता के वकील आरसी गौतम ने कोर्ट को बताया कि सुंदरी देवी के ससुर सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) में तैनात थे और 19 नवंबर 2016 को ड्यूटी के दौरान ही उनकी मौत हो गई. उस समय मृतक के इकलौते बेटे यानी सुंदरी के पति एक गंभीर हादसे का शिकार होकर बिस्तर पर थे. ऐसे में बहू ने ही परिवार को संभालने के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया, जिसे विभाग ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. इस बीच 25 मई 2020 को सुंदरी के पति का भी निधन हो गया, जिससे पूरे परिवार के गुजर-बसर का संकट खड़ा हो गया.

30 दिन की नियुक्ति पत्र सौंपने के आदेश
हाईकोर्ट ने सुंदरी देवी के हक में फैसला देते हुए पीडब्ल्यूडी विभाग को अल्टीमेटम दिया है. अदालत ने कहा कि विभाग बिना किसी बहानेबाजी के अगले 30 दिनों में याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र सौंपे. कोर्ट ने कड़ी हिदायत दी है कि अब किसी भी तरह की तकनीकी अड़चन नहीं आनी चाहिए और प्रक्रिया में एक दिन की भी देरी बर्दाश्त नहीं होगी.

45 दिन में पेश करनी होगी रिपोर्ट
अदालत ने इस मामले में सीधे अधिकारियों की जवाबदेही तय की है. कोर्ट ने आदेश दिया कि 45 दिनों के भीतर इस फैसले पर अमल की रिपोर्ट (Compliance Report) पेश की जाए. जस्टिस चिरानियां ने सख्त चेतावनी दी कि यदि आदेश लागू करने में लापरवाही हुई, तो जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी. इस फैसले ने उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद जगाई है जो ससुराल में रहकर पूरे परिवार का सहारा बनी हुई हैं.

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