हाईकोर्ट का अहम आदेश, सिवनी हवाला कांड में डीएसपी और 2 को राहत, एफआईआर रद्द

मध्य प्रदेश राज्य

सिवनी

सिवनी हवाला कांड एक बार फिर सुर्खियों में है, जब इस मामले की सुनवाई कर रही हाई कोर्ट ने आरोपियों को बड़ी राहत प्रदान की है। कोर्ट ने डीएसपी पंकज मिश्रा, आरक्षक प्रमोद सोनी और व्यापारी पंजू गिरी गोस्वामी की याचिका पर सुनवाई के बाद एफआईआर रद्द करने के आदेश जारी किए हैं। हालांकि, इसी केस में आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका खारिज कर दी गई है।

यह मामला पिछले साल अक्टूबर में सामने आया था, जब पुलिस ने सीलादेही चौक पर महाराष्ट्र के हवाला कारोबारी सोहन लाल परमार की कार से 2.96 करोड़ रुपये की नकदी जब्त की थी। विवाद तब शुरू हुआ जब पुलिस रिकॉर्ड में केवल 1.45 करोड़ रुपये की रकम दर्ज की गई। इस पर आरोप लगे कि रकम की असली मात्रा छुपाई गई। इसके बाद लखनवाड़ा थाना में सिवनी पुलिस की तत्कालीन एसडीओपी पूजा पाण्डेय और डीएसपी पंकज मिश्रा सहित 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज किया गया।

81 फोन कॉल और व्हाट्सएप चैट थे आधार
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में बताया गया कि घटना के दौरान मिश्रा और पूजा पांडे के बीच 81 बार फोन पर बातचीत हुई थी। साथ ही आरोप लगाया गया कि मिश्रा ने अपने मोबाइल से कुछ अहम व्हाट्सएप चैट और वीडियो हटाए (डिलीट किए), जिससे उनकी भूमिका संदिग्ध बनती है।

हाईकोर्ट ने खारिज कर दी FIR?
जस्टिस हिमांशु जोशी की सिंगल बेंच ने केस डायरी का विश्लेषण करते हुए पाया कि केवल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) किसी अपराध को साबित करने के लिए काफी नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि बातचीत का कोई रिकॉर्ड या ट्रांसक्रिप्ट पेश नहीं किया गया, जिससे साजिश साबित हो सके।

पंकज मिश्रा को न पैसा मिला, न नाम आया
कोर्ट ने यह भी माना कि मिश्रा के पास से कोई भी रकम बरामद नहीं हुई और न ही किसी गवाह या शिकायतकर्ता ने उनका नाम लिया। साथ ही यह भी कहा गया कि सूचना साझा करना एक पुलिस अधिकारी की ड्यूटी का हिस्सा हो सकता है।

SC केस का हवाला देकर FIR और चार्जशीट की रद्द
जबलपुर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित भजन लाल केस का हवाला देते हुए कहा कि जब FIR में प्रथमदृष्टया (पहली नजर में) अपराध नहीं बनता, तो ऐसी कार्यवाही जारी रखना न्याय के खिलाफ है।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संदेह कितना भी गहरा हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने DSP पंकज मिश्रा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत दर्ज FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही, उन्हें पूरी तरह आरोपों से मुक्त कर दिया है।

हाई कोर्ट ने दी तीन आरोपियों को राहत
हाई कोर्ट में बुधवार को हुई सुनवाई में तीन आरोपियों के पक्ष में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने पैरवी की। कोर्ट ने याचिकाओं को स्वीकार करते हुए एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट के अनुसार, मामले में कोई ठोस साक्ष्य नहीं हैं जो साजिश या आपसी मिलीभगत साबित करते हों।

2.96 करोड़ जब्त किए रिकॉर्ड में 1.45 करोड़ दिखाए
यह मामला 8 अक्टूबर 2025 को सिवनी में सामने आए हवाला कांड से जुड़ा है। उस समय डीएसपी पूजा पाण्डेय के नेतृत्व में पुलिस टीम ने सीलादेही चौक पर महाराष्ट्र के हवाला कारोबारी सोहनलाल परमार की कार से करीब 2.96 करोड़ रुपए नकद जब्त किए थे।

आरोप था कि पुलिस टीम ने पूरी रकम जब्त की, लेकिन रिकॉर्ड में सिर्फ 1.45 करोड़ रुपए ही दिखाए गए। मामला सामने आने पर लखनवाड़ा थाना में एसडीओपी पूजा पाण्डेय, डीएसपी पंकज मिश्रा सहित 11 पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज किया गया था।

साजिश या समझौते का ठोस सबूत नहीं
मामले की सुनवाई जस्टिस हिमांशु जोशी की अदालत में हुई। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों के बीच पहले से कोई साजिश या आपसी समझौता था।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोप केवल शक और अनुमान पर आधारित हैं। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) मात्र से अपराध सिद्ध नहीं होता। साजिश के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं। ऐसे में मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 310(2), 126(2), 140(3), 61(2) और 238(b) के आवश्यक तत्व इन आरोपियों पर लागू नहीं होते, इसलिए चार्जशीट और सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द की जाती है।

नीरज राजपूत को राहत नहीं
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जिस टीम ने कार रोकी और नकदी बरामद की, उसमें उसकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, इसलिए उसके खिलाफ ट्रायल जारी रहेगा।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि केवल कॉल रिकॉर्ड या संदेह के आधार पर किसी को आपराधिक मुकदमे में नहीं फंसाया जा सकता। जांच एजेंसियों को गंभीर मामलों में भी ठोस साक्ष्य पेश करना अनिवार्य है।

कोर्ट का निर्णय: आरोप आधारहीन और शक पर आधारित
हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मामला केवल अनुमान और संदेह पर आधारित है। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) के आधार पर कोई अपराध सिद्ध नहीं होता। इसका कोई सुनिश्चित सबूत नहीं मिला है कि आरोपितों के बीच मिलीभगत या अपराधिक साजिश रची गई हो।

चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही पर रोक
कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 310(2), 126(2), 140(3), 61(2) और 238(b) के अनुसार यह माना कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा चलाना कानून का दुरुपयोग होगा। इसलिए चार्जशीट को निरस्त करते हुए आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का निर्देश दिया।

आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका खारिज
हालांकि, आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका को कोर्ट ने खारिज किया है। कोर्ट के अनुसार, उसने टीम के साथ कार रोकी और रकम की जब्ती में भूमिका निभाई थी, इसलिए उसके खिलाफ ट्रायल जारी रहेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शक और कॉल रिकॉर्ड के आधार पर किसी व्यक्ति को बिना ठोस सबूत के आपराधिक मुकदमे में नहीं लाया जा सकता। यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल है कि अब उन्हें गंभीर मामलों में स्पष्ट और मजबूत साक्ष्य पेश करना होगा।

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