बिस्को इंडस्ट्रीज के बंद होने से बिक्रमगंज का औद्योगिक स्वर्णिम दौर पूरी तरह खत्म हो गया

राज्य

 रोहतास

 कभी बिक्रमगंज की पहचान और औद्योगिक शान रहा बिस्को इंडस्ट्रीज अब इतिहास बन चुका है।

वर्षों से उपेक्षा और बदहाली झेल रहे इस प्रतिष्ठान को आखिरकार कबाड़ में बेच दिया गया। इसके साथ ही इसके दोबारा चालू होने की बची-खुची उम्मीद भी खत्म हो गई।

करीब 30 एकड़ में फैला यह औद्योगिक परिसर कभी सैकड़ों लोगों को रोजगार देता था और इलाके की अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता था। आज यहां सिर्फ जर्जर इमारतें, बंद गोदाम और वीरानी नजर आती है।

कभी वीआईपी ठहरते थे, अब खंडहर
एक समय ऐसा था जब बिस्कोमान परिसर का निरीक्षण भवन वीआईपी मूवमेंट का केंद्र हुआ करता था। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से लेकर कई केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारी यहां ठहर चुके हैं।

9 अप्रैल 1984 को तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने बिक्रमगंज अनुमंडल का उद्घाटन भी यहीं से किया था। लेकिन आज हालात यह हैं कि परिसर में जब्त ट्रक, पत्थर-गिट्टी और कबाड़ जमा है।

कभी यहां जब्त शराब और मांस के विनष्टीकरण जैसी कार्रवाई भी की जाती थी, जिसे बाद में अधिकारियों की आपत्ति के बाद बंद करना पड़ा।

आय के स्रोत बंद, हालत बदतर
बिस्को इंडस्ट्रीज की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। पहले यहां चावल मिल, गोदाम किराया, ब्रान बिक्री और बिस्कोमान भवन से अच्छी आमदनी होती थी। लेकिन चावल मिल बंद होने से ब्रान उत्पादन ठप हो गया।

भवन जर्जर होने के कारण यहां अब कोई ठहरता नहीं है। पहले जहां एफसीआई और एसएफसी समेत कई एजेंसियां गोदाम किराए पर लेती थीं।

वहीं अब सिर्फ एक गोदाम एसएफसी को किराए पर है। वर्तमान में यहां सीमित स्तर पर केवल रासायनिक खाद की बिक्री हो रही है और महज 3–4 कर्मचारी बचे हैं।

सरकारी उपेक्षा से बुझा उद्योग
करीब आठ दशक पहले स्थापित यह राइस मिल अपने समय में अत्याधुनिक मानी जाती थी। बताया जाता है कि 1940 के दशक में जापानी तकनीक से इसकी शुरुआत हुई थी।

हालांकि बिजली की कमी के कारण यह पूरी तरह स्वचालित रूप से संचालित नहीं हो सका और धीरे-धीरे बंद हो गया। 80 के दशक में सहकारिता नेता स्व. तपेश्वर सिंह के प्रयास से बिस्कोमान ने इसे अधिग्रहित किया।

यहां कैटल फीड और साल्वेंट प्लांट जैसी परियोजनाओं की शुरुआत भी हुई, लेकिन उनके निधन के बाद योजनाएं अधूरी रह गईं और उद्योग लगातार गिरावट की ओर बढ़ता गया।

हजारों रोजगार की उम्मीद टूटी
अगर समय रहते इस उद्योग को पुनर्जीवित किया जाता, तो आज यहां करीब एक हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता था।

स्थानीय लोग मानते हैं कि यह सिर्फ एक फैक्ट्री का बंद होना नहीं, बल्कि पूरे इलाके की आर्थिक संभावनाओं का खत्म होना है।

आज बिस्को इंडस्ट्रीज का कबाड़ में बिकना न सिर्फ एक औद्योगिक इकाई का अंत है, बल्कि बिक्रमगंज के स्वर्णिम औद्योगिक अतीत के अंतिम अध्याय का भी समापन है।

 

What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry