पुलिस कस्टडी टॉर्चर केस: हाईकोर्ट ने सीसीटीवी और मेडिकल सर्टिफिकेट पर उठाए सवाल

राज्य

 रांची

झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के गंभीर मामले पर सख्ती दिखाते हुए स्वत: संज्ञान लिया है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य प्रशासन से कड़े सवाल पूछे. कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि हिरासत में मानवाधिकारों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

सीसीटीवी और निगरानी व्यवस्था पर सवाल
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सरायकेला एसपी से पूछा कि राज्य के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं. अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि क्या हिरासत में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं. कोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि निगरानी व्यवस्था की कमी को गंभीरता से लिया जा रहा है.

स्वास्थ्य विभाग से भी मांगा जवाब
अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को भी तलब किया है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि वे यह स्पष्ट करें कि पीड़ित तरुण महतो को “फिट फॉर कस्टडी” का प्रमाण पत्र देने वाले चिकित्सक के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है. यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि हिरासत में किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है, और इसमें लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है.

पीड़ित को मिला मुआवजा
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि पीड़ित तरुण महतो को 1.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है. हालांकि, अदालत का ध्यान केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरे मामले में जवाबदेही तय करना चाहती है. कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो.

घटना की पृष्ठभूमि
यह मामला 19 नवंबर 2025 की रात का है, जब ईचागढ़ पुलिस तरुण महतो को हिरासत में लेकर गई थी. आरोप है कि थाने में उसकी बेरहमी से पिटाई की गई. इस घटना के बाद पीड़ित की पत्नी ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई थी. इसी पत्र को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया.

अगली सुनवाई 18 जून को
खंडपीठ ने सभी संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 18 जून को निर्धारित की गई है. अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन कोर्ट के सवालों का क्या जवाब देता है और इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है.

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