बैंकिंग मनमानी पर अदालत का बड़ा फैसला: संदिग्ध ट्रांजैक्शन के नाम पर खाता बंद करने पर सवाल

राज्य

चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बैंक खातों को फ्रीज करने की मनमानी प्रवृत्ति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि केवल संदिग्ध लेनदेन की छोटी राशि के आधार पर पूरे खाते को सील करना कानूनसम्मत नहीं है, खासकर तब जब खाताधारक किसी एफआईआर में नामजद न हो और मजिस्ट्रेट का वैधानिक आदेश भी मौजूद न हो।

जस्टिस जगमोहन बंसल की पीठ ने त्रिपत जीत सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए एचडीएफसी बैंक को उनका बैंक खाता एक सप्ताह के भीतर डी-फ्रीज करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उनका बैंक खाता बिना किसी पूर्व सूचना के फ्रीज कर दिया गया। बैंक ने यह कार्रवाई कथित तौर पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों के निर्देश पर की थी। उनके खाते में मात्र 5,000 रुपये की एक संदिग्ध एंट्री आई थी, लेकिन न तो उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज था और न ही किसी वित्तीय धोखाधड़ी में उनकी संलिप्तता का आरोप था। सबसे महत्वपूर्ण यह कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 107 के तहत किसी मजिस्ट्रेट का खाता अटैचमेंट आदेश भी नहीं था।

बैंक का पक्ष- एजेंसियों के निर्देश पर हुई कार्रवाई
सुनवाई में बैंक की ओर से भी स्वीकार किया गया कि बैंक ने केवल एजेंसियों के निर्देशों पर कार्रवाई की और उसके पास मजिस्ट्रेट का कोई आदेश नहीं है। बैंक ने यह भी माना कि उसे याचिकाकर्ता की किसी आपराधिक भूमिका की जानकारी नहीं है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि बीएनएनएस की धारा 106 के तहत सीधे बैंक खाता अटैच या डेबिट फ्रीज नहीं किया जा सकता। ऐसा कदम केवल धारा 107 के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश से ही संभव है। अदालत ने कहा कि किसी निर्दोष व्यक्ति का पूरा बैंक खाता फ्रीज कर देना अनुपातहीन, मनमाना और आजीविका के अधिकार पर सीधा प्रहार है।

अब सिर्फ 5 हजार की राशि रहेगी फ्रीज
कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि किया कि साइबर फ्राॅड या संदिग्ध ट्रांजैक्शन की राशि यदि सीमित और पहचान योग्य हो, तो केवल उतनी राशि सुरक्षित रखी जा सकती है, पूरे खाते को बंद करना उचित नहीं। इसी आधार पर अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता का पूरा खाता तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए, हालांकि विवादित 5,000 रुपये की राशि फिलहाल फ्रीज रहेगी और उसका उपयोग नहीं किया जाएगा।

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में जांच में याचिकाकर्ता की संलिप्तता सामने आती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन मौजूदा स्थिति में बैंक और एजेंसियां वैधानिक प्रक्रिया से बाहर जाकर नागरिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकतीं। यह फैसला हजारों खाताधारकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिनके खाते मामूली संदिग्ध लेनदेन पर अचानक फ्रीज कर दिए जाते हैं।

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