‘निर्भरता केवल पैसों की नहीं होती’— HC ने दादा के मुआवजे को रखा बरकरार, 28 साल पुराने रेल हादसे में फैसला

राज्य

चंडीगढ़ 
वर्ष 1998 के खन्ना रेल दुर्घटना मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। करीब 28 वर्ष बाद पोती की मौत पर उसके दादा को दिए गए चार लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा गया है।  अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की निर्भरता का आकलन केवल आर्थिक आधार पर नहीं किया जा सकता। परिवार के भीतर मिलने वाला प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहारा भी निर्भरता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

जस्टिस पंकज जैन ने केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे की अपील खारिज कर दी। उन्होंने रेलवे दावा अधिकरण के आदेश को सही ठहराया। 26 नवंबर 1998 को खन्ना-लुधियाना रेलखंड पर भीषण हादसा हुआ था। इसे देश के सबसे भयावह रेल हादसों में गिना जाता है। इस दुर्घटना में दावेदार की पोती सहित परिवार के कई सदस्य मारे गए थे। कोलकाता जा रही सियालदह एक्सप्रेस पटरी से उतरे अमृतसर जाने वाली ट्रेन के छह डिब्बों से टकरा गई थी। दोनों ट्रेनों में करीब 2500 यात्री सवार थे। हादसे में करीब 212 लोगों की मौत हुई थी।

मुआवजे पर रेलवे का तर्क 
पोती की मृत्यु के बाद रेलवे दावा अधिकरण ने दादा के पक्ष में चार लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे के महाप्रबंधक ने इस आदेश को चुनौती दी। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। उनका तर्क था कि रेलवे अधिनियम के तहत केवल वही व्यक्ति मुआवजे का दावा कर सकता है जो मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर हो।

निर्भरता की व्यापक अवधारणा
सुनवाई के दौरान जस्टिस जैन ने खंडपीठ के एक पूर्व फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि निर्भरता की अवधारणा को संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक जुड़ाव, स्नेह, संरक्षण और देखभाल भी महत्वपूर्ण है। यह आर्थिक सहायता जितनी ही अहमियत रखती है। अदालत ने निर्भरता को केवल वित्तीय दायरे तक सीमित रखने से इन्कार किया।

दादा-पोती का भावनात्मक रिश्ता
अदालत ने कहा कि दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच एक विशेष भावनात्मक रिश्ता होता है। ऐसे में दादा अपनी पोती पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे, इस आधार पर उन्हें मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। दावेदार का कोई अन्य पोता या पोती नहीं था। हाईकोर्ट ने कहा कि दादा-दादी की अपने पोते या पोती पर प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहारे के लिए निर्भरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया मुआवजा पूरी तरह न्यायसंगत है। अदालत ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए चार लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा। 

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