पेट्रोल छोड़ EV की ओर बढ़े डिलीवरी पार्टनर, 60% गिग वर्कर्स को हुआ सीधा फायदा

फर्श से अर्श तक

 ग्वालियर
पीठ पर भारी – भरकम डिलीवरी बैग, माथे पर पसीने की बूंदें और दिल में पेट्रोल के मीटर को देखकर बढ़ती धडकऩे…। ये आज के देशभर की सड़कों का कड़वा सच है। वहीं, बात करें मध्य प्रदेश के ग्वालियर की तो शहर में अचलेश्वर मंदिर की चौखट से लेकर महाराज बाड़े की तंग और व्यस्त गलियों तक जो युवा शहर की रफ्तार बने हुए थे, उनके बजट को भी पेट्रोल की लगातार बढ़ती कीमतों ने हिलाकर रख दिया है। आलम ये है कि, कमाई 'सेंटीमीटर' में सिमटती चली जा रही है और पेट्रोल के खर्च 'किलोमीटर' की रफ्तार से भागते चले जा रहा है, लेकिन ग्वालियर के बड़ी आबादी के युवाओं ने भी हार मानने के बजाय एक 'स्मार्ट' ऑप्शन खोज निकाला है।

ईंधन की इस बेलगाम बढ़ती आग से बचने के लिए शहर के करीब 60 फीसदी गिग वर्कर्स ने पेट्रोल को 'बाय – बाय' कह दिया है और ईवी (इलेक्ट्रिक व्हीकल) की राह थाम ली है।

जुगाड़ और स्मार्ट वर्क का नया फॉर्मूला
ग्वालियर की इस गिग इकोनॉमी का पूरा गणित ही बदलकर रख दिया है। शहर में 750 से अधिक गिग वर्कर्स एक्टिव हैं, जो रोजाना डिलिवरी पहुंचाते हुए 50 से 80 किलो मीटर तक की यात्रा शहर के भीतर ही तय कर लेते हैं। दिनभर में 7 से 8 ऑडर्स निपटाने और प्रति ऑर्डर 50 से 100 रुपए कमाने वाले इन युवाओं के लिए पेट्रोल का खर्च एक गहरा आर्थिक घाव बन रहा था। ऐसे में उन्होंने तीन बड़े बदलाव किए हैं।

बाइक को कहा अलविदा, ई-स्कूटर का स्वागत
कई युवाओं ने अपनी पुरानी पेट्रोल बाइक बेच दी और बची – खुची जमा पूंजी से डाउन पेमेंट देकर नया ई-स्कूटर घर ले आए।

किराए की सवारी का सहारा
जो युवा नया वाहन खरीदने का जोखिम नहीं उठा सकते, वे अब किराए की ई – बाइक लेकर रोजाना की पेट्रोल की मार से खुद को बचा रहे हैं।

लंबी दूरी को सीधे 'नो'
अब आंख मूंदकर ऑडर्स नहीं उठाए जा रहे। युवाओं ने 'फिल्टरिंग' शुरू कर दी है। लंबी दूरी के ऑडर्स को छोड़कर कम दूरी वाले ट्रिप्स से ईंधन और समय का संतुलन बिठाया जा रहा है।

रोजगार का बढ़ता ग्राफ और चुनौती…
रोजगार कार्यालय के उप संचालक (रोजगार) पवन कुमार भिवटे कहते हैं कि, ग्वालियर में गिग वर्कर्स का काम तेजी से बढ़ता जा रहा है। एक सिंगल रोजगार मेले से ही कंपनियों को 20 – 25 युवा मिल जाते हैं और सालभर में 200 से ज्यादा युवा इस क्षेत्र से जुड़ रहे हैं। चूंकि, इनका पूरा काम दोपहिया वाहन पर ही टिका है, इसलिए पेट्रोल का महंगा होना सीधे इनके मुनाफे पर चोट कर रहा है।

पेट्रोल की टंकी जेब खाली कर रही थी
शहर के एक गिग वर्कर श्याम कुमार ने पत्रिका से बातचीत के दौरान बताया कि, पहले बाइक से ही दिनभर भागदौड़ होती थी, लेकिन जब पेट्रोल के दाम बजट से बाहर होने लगे तो ईवी ही एकमात्र रास्ता बचा। मैं रोजाना करीब 8 पार्सल डिलीवर करता हूं और हाल ही में इलेक्ट्रिक व्हीकल पर शिफ्ट हुआ हूं, जिससे अब कुछ बचत हो पाती है।

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