ग्वालियर
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बलिदानी सैनिकों के आश्रितों को विशेष नियुक्ति देने के मामले में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि 'जो राष्ट्र अपने शहीदों को भूल जाता है और उनका सम्मान नहीं करता, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता।'
न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की एकलपीठ ने शहीद सैनिक के पुत्र अभय सिंह तोमर की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि राज्य सरकार के गृह विभाग ने शहीद के आश्रित को मिलने वाली विशेष नियुक्ति को सामान्य अनुकंपा नियुक्ति मानकर गंभीर कानूनी भूल की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य पूरी तरह अलग है।
बलिदानी के परिवार को सम्मानजनक जीवन देना है
कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद केवल मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना होता है, जबकि शहीद सैनिक के आश्रित को दी जाने वाली विशेष नियुक्ति का उद्देश्य राष्ट्र के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करना और उसके परिवार को सम्मानजनक जीवन देना है।
अदालत ने कहा कि अधिकांश सैनिक कम उम्र में बलिदानी होते हैं और उनके बच्चे अक्सर नाबालिग या जन्म भी नहीं लिए होते। ऐसे में विशेष नियुक्ति की नीति में कोई समय-सीमा नहीं रखी गई है। इसके बावजूद गृह विभाग ने अनुकंपा नियुक्ति की सात वर्ष की समय-सीमा को विशेष नियुक्ति पर लागू कर दिया, जो पूरी तरह मनमाना और अवैध है।
समाज में यह संदेश जाएगा कि राष्ट्र अपने बलिदानियों को भूल गया
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि शहीद के बच्चों को बड़े होने के बाद सम्मानजनक रोजगार के लिए वर्षों तक भटकना पड़े, तो समाज में यह संदेश जाएगा कि राष्ट्र अपने बलिदानियों को भूल गया है। इससे भविष्य में युवाओं का देशसेवा और सर्वोच्च बलिदान के प्रति विश्वास भी प्रभावित हो सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि बलिदानी सैनिकों के परिवारों के साथ ऐसा व्यवहार अधिकारियों की सैनिकों के जीवन और उनके परिवारों के संघर्ष के प्रति असंवेदनशीलता को दर्शाता है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को उसकी शैक्षणिक योग्यता के अनुसार दो माह के भीतर विशेष नियुक्ति दी जाए।
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