एक कांग्रेस नेता के बयान ने समाजवादी पार्टी में हंगामा मचा दिया है। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने कहा है कि समाजवादी पार्टी को मुसलमान बतौर लीडर बर्दाश्त नहीं है। निहितार्थ यह कि बतौर वोटर तो समाजवादी पार्टी में मुसलमानों का स्वागत है, लेकिन नेता के रूप में नहीं। मतलब आप मुसलमान हैं तो सपा के जीतने की स्थिति में हो सकता है मंत्री बना दिए जाएं, लेकिन मुख्यमंत्री बन जाएं, यह मुमकिन नहीं। सरल शब्दों में कहें तो समाजवादी पार्टी या उसकी सरकार की कमान किसी मुसलमान के हाथ में नहीं दी जाएगी।
इमरान मसूद ने एक तरह से ओवैसी के उस सवाल को जायज़ बता दिया है, जिसमें वह कहते हैं कि मुसलमान, भारत की पॉलिटिकल पार्टियों में सिर्फ दरी बिछाने के लिए हैं, सत्ता में भागीदारी के लिए नहीं। हालांकि यह वाक्य भारत की हर उस पार्टी के लिए सही ठहरता है, जिसने मुसलमानों के तुष्टीकरण के लिए काम किया। बीजेपी को छोड़कर लगभग सभी पार्टियों का चरित्र वही है।
मसूद के इस बयान के बाद से सपा के भीतर बतकही शुरू हो गई है। पहली पंक्ति के नेता इस बात से डरे हुए हैं कि इमरान मसूद की यह बात सपा के भीतर मुस्लिम कार्यकर्ताओं में फैल न जाए और वे कुछ दिनों में इस सवाल का जवाब न ढूंढ़ने लगें कि सपा में मुसलमानों का भविष्य क्या है? मुस्लिम कार्यकर्ता सपा में किसी ताकतवर मुस्लिम लीडर का नाम खोजते भी हैं तो बमुश्किल एक नाम आज़म खां का मिलता है, जो अपनी ही कौम पर अत्याचार करने और भ्रष्टाचार के मामलों में जेल में हैं। लिहाज़ा उनका यह डर जायज़ है कि सपा में मेरा या मेरी कौम का मुस्तकबिल क्या है?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से सपा के पास 11 सीटें हैं, जो अच्छी खासी मुस्लिम जनसंख्या वाले इलाके हैं। अगर चुनाव से 6 महीने पहले इस इलाके के मुस्लिम वोटरों में यह असमंजस फैल गया कि वे सपा की ओर ही रहें, या फिर कांग्रेस की ओर जाएं, तो ये सपा के लिए कोई अच्छी तस्वीर नहीं है। आने वाले समय में समाजवादी पार्टी में मुस्लिम नेताओं का असंतोष बाहर आएगा, यह तय है। मुरादाबाद में कमाल अख्तर और जावेद अली का सिर उठाना इस बात का सबूत है कि तलवारें म्यान से बाहर आने लगी हैं। आज़म खां की राजनीति लगभग खत्म होने के कगार पर है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम नेता चाहते हैं कि उनकी भागीदारी सूबे की राजनीति में और बढ़े और सत्ता मिलने पर कुर्सी भी मिले। बहुत मुमकिन है कि सपा के भीतर मुस्लिम नेताओं के इस उहापोह का इस्तेमाल ओवैसी की पार्टी कर ले जाए। आखिर बिहार में उसने अपना परफॉर्मेंस पिछले चुनाव में दोहराया तो है ही, साबित भी किया है कि मुसलमान ओवैसी की इस बात का यकीन करने लगे हैं कि सारे राजनैतिक दल उनसे अभी तक दरी बिछवाने का काम ही करवाते आ रहे हैं।
उधर अखिलेश का सनातनी वोटों का लालच मुस्लिम वोटरों को वैसे ही असमंजस में डाल रहा है। उनको लगने लगा है कि अगर अखिलेश आज अयोध्या को विश्वविख्यात धर्म नगरी बनाने का वादा कर रहे हैं, तो कल मुख्यमंत्री बनने के लिए मथुरा व काशी के विवादास्पद स्थलों को भी हिंदुओं को देने की बात न करने लगें। यह डर मुसलमानों के असमंजस को और पुख्ता करता है, भयावह बनाता है।
द्वैध में फंसा यही मुसलमान सपा नेतृत्व के लिए घातक सिद्ध होने वाला है, क्योंकि गैर भाजपा पार्टियों ने हमेशा उसका इस्तेमाल निगेटिव वोटिंग के लिए किया। यानी बीजेपी को जो पार्टी हराए, मुसलमान उसी को वोट दें। ऐसी अपील कई दशकों से होती आई है और इसीलिए मुसलमान सपा, आरजेडी, आप और कांग्रेस जैसे राजनैतिक दलों के औज़ार बनते गए। यह अलग बात है कि जीतने पर इन पार्टियों ने उनके मुस्तकबिल के लिए कभी कोई काम नहीं किया। इसीलिए इस बार उत्तर प्रदेश का मुसलमान ओवैसी में भी अपना भविष्य तलाश सकता है। ज़ाहिर है उसका शिफ्ट सपा को भारी नुकसान पहुंचाने वाला है। याद कीजिए इमरान मसूद को वो तल्ख बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि सुल्तानपुर के एनकाउंटर के बाद सपा नेता यादव परिवारों से तो मिलने गए, लेकिन कोई भी मुस्लिम परिवारों से मिलने नहीं गया। इस तल्खी को छोटा न समझिए। आने वाले समय में सपा व कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे में भी इसकी झलक मिलना तय है।
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