भोपाल
उज्जैन के इंगोरिया विकासखंड की एक छोटी सी आंगनवाड़ी में रोज़ की तरह खिलखिलाते बच्चों का शोर था, लेकिन यहाँ बच्चों को केवल पोषाहार या प्राथमिक अक्षर-ज्ञान ही नहीं मिल रहा था, बल्कि उनके नन्हे हाथों में एक नया आत्मविश्वास बुना जा रहा था। इस बदलाव की सूत्रधार थीं दिव्या नागर—एक ऐसी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, जिनके भीतर एक मुक्केबाज़ (बॉक्सर) का जज़्बा और एक माँ जैसी ममता दोनों एक साथ धड़कते हैं।
दिव्या जानती थीं कि ग्रामीण क्षेत्रों के इन बच्चों में असीम क्षमताएं छिपी हैं, बस ज़रूरत है तो सही दिशा और एक अवसर की। उन्होंने आंगनवाड़ी के आँगन में स्वास्थ्य और अनुशासन का इस प्रकार समन्वय किया कि बच्चे उत्साहित होकर उनकी हर बात मानने लगे। वे बच्चों को खेलों से जोड़ने के साथ-साथ रोज़ नियमित रूप से योग-अभ्यास भी कराने लगीं। सुबह के समय नन्हे-मुन्ने बच्चों को योगासन और प्राणायाम करते देखना गाँव वालों के लिए भी एक सुखद अनुभव बन गया था। दिव्या का मानना है कि योग से न केवल बच्चों का शरीर स्वस्थ रहता है, बल्कि उनका मन भी शांत और एकाग्र होता है। दिव्या अक्सर बच्चों से कहती थीं कि खेल और योग केवल शरीर को मजबूत नहीं बनाते, वे मन से हार का डर भी मिटाते हैं और ध्यान केंद्रित करना सिखाते हैं।
रिंग में बॉक्सिंग के दांव-पेच सीखने वाली दिव्या अब इन बच्चों को योग और बेसिक फिटनेस के ज़रिए अनुशासन, फुर्ती और लगन के पाठ सिखा रही थीं। मिट्टी में खेलने वाले नन्हे-मुन्ने बच्चे जब दिव्या के साथ योगासन करते और पंचिंग की ट्रेनिंग लेते, तो उनकी आँखों में एक अलग ही चमक होती।
गांव के लोग जो शुरुआत में आंगनवाड़ी को सिर्फ 'दलिया और टीकाकरण' की जगह मानते थे, अब हैरान थे। उन्हें दिखने लगा था कि एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की लगन कैसे उनके बच्चों के संपूर्ण स्वास्थ्य और सोच को बदल सकती है।
दिव्या का सपना सिर्फ आज का स्वास्थ्य सुधारना नहीं है; उनकी आँखों में एक बड़ा मंज़र तैरता है—वह दिन जब उनके गांव का कोई बच्चा राष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराएगा और एक दिन ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतकर भारत का नाम रोशन करेगा।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
