झारखंड के राजस्व पर संकट का दावा, खनिज संशोधन विधेयक के खिलाफ हेमंत सोरेन का मोर्चा

राज्य

 रांची
 मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक,2026 के विरोध में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है। साथ ही उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी पत्र लिखकर इसपर हस्तक्षेप करने तथा विरोध में सहयोग का अनुरोध किया है।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में हेमंत ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन के अंतर्गत एमएमडी आर अधिनियम में धारा 9-डी जोड़े जाने का प्रविधान किया गया है, जिसके अनुसार राज्य सरकारें खनिज अधिकारों अथवा खनिज वहन भूमि पर किसी प्रकार का कर, उपकर (सेस) अथवा अन्य लेवी केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों एवं प्रतिबंधों के अधीन ही लगा सकेंगी। साथ ही कुछ परिस्थितियों में पूर्व में लगाए गए ऐसे उपकरों के बकाया दावों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि यह विषय विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मिनरल एरिया डवलपमेंट अथारिटी बनाम स्टील अथारिटी आफ इंडिया लिमिटेड मामले में यह स्पष्ट किया था कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के अंतर्गत राज्यों को खनिज वहन भूमि पर कर अथवा उपकर लगाने का अधिकार प्राप्त है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि खनिज का मूल्य अथवा उत्पादन ऐसे कर निर्धारण का आधार हो सकता है। हेमंत के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के इसी निर्णय के आधार पर झारखंड विधानसभा ने झारखंड मिनर लबेयरिंग लैंड सेस अधिनियम, 2024 पारित किया तथा उसके अंतर्गत नियम अधिसूचित किए।

यह कोई प्रशासनिक निर्णय नहीं था बल्कि राज्य विधानमंडल द्वारा संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप बनाया गया कानून था। इस कानून का उद्देश्य केवल राजस्व संग्रह नहीं, बल्कि खनन से प्रभावित क्षेत्रों के विकास, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण आधारभूत संरचना तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए संसाधन उपलब्ध कराना था।

हेमंत के अनुसार, यदि यह संशोधन प्रभावी होता है और राज्य की उपकर लगाने की शक्ति सीमित अथवा समाप्त होती है तो झारखंड को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व से वंचित होना पड़ सकता है।

इससे राज्य की विकास योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों तथा खनन प्रभावित क्षेत्रों के विशेषकर आदिवासी समुदायों को विस्थापन, भूमि से वंचित होने, पर्यावरणीय क्षति, प्रदूषण, पारंपरिक आजीविकाओं के नुकसान तथा सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

मुख्यमंत्री ने आशा व्यक्त की है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इस विधेयक के संवैधानिक, संघीय, वित्तीय एवं सामाजिक प्रभावों पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे। बता दें कि इस बिल के विरोध में झामुमो महाआंदोलन की तैयारी भी कर रहा है

What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry