नई दिल्ली
इंडिया टुडे और सी-वोटर के 'मूड ऑफ द नेशन' (MOTN) सर्वे में देश की बदलती राजनीतिक और सामाजिक बयार का बड़ा आकलन सामने आया है. हालिया 'Gen-Z' प्रोटेस्ट के बाद किया गया यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक सर्वे है, जिसमें युवाओं और आम जनता की नब्ज टटोलने की कोशिश की गई है. इस सर्वे में देश के मूड को लेकर कई अहम सवाल पूछे गए हैं।
सर्वे का फोकस मौजूदा हालात से लेकर आने वाले चुनाव तक के सवालों पर है. इसमें NEET संकट से 2029 के बैलेट तक देश के लोगों की राय जानने की कोशिश की गई है. लोगों से यह भी पूछा गया कि क्या एक इस्तीफे के बाद जेन-जी संतुष्ट है या यह विरोध सिर्फ शुरुआत है।
नौकरी या शिक्षा, बड़ा मुद्दा क्या?
सर्वे में जब देश के GenZ से पूछा गया कि अभी उनके लिए सबसे अहम मुद्दा क्या है, तो सबसे बड़ी संख्या में उन्होंने नौकरी को चुना. 53 प्रतिशत युवाओं ने साफ कहा कि रोजगार ही उनकी सबसे बड़ी चिंता है. इसके बाद 22 प्रतिशत ने शिक्षा को अपना सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बताया. रहन-सहन का खर्च यानी महंगाई 12 प्रतिशत युवाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा निकला, जबकि मानसिक स्वास्थ्य को सिर्फ 4 प्रतिशत ने प्राथमिकता दी।
ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि बेरोजगारी की समस्या युवाओं के मन में बाकी सब मुद्दों से ऊपर है।
युवाओं को उपलब्ध मौके पर क्या राय है?
सर्वे में युवाओं से यह भी पूछा गया कि देश में उन्हें उपलब्ध मौकों को लेकर उनकी क्या राय है. जवाब में 32 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि कठिन मेहनत और प्रतिभा आज भी मायने रखती है. 26 प्रतिशत का मानना था कि असल में पैसा और संपर्क ही काम आते हैं. 22 प्रतिशत युवाओं ने यह राय रखी कि देश में बहुत कम मौके उपलब्ध हैं, जबकि 14 प्रतिशत का कहना था कि मौके तो हैं लेकिन वे चुनिंदा क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।
रोजगार योग्य बनाने की जिम्मेदारी किसकी?
जब युवाओं से पूछा गया कि उन्हें रोजगार योग्य बनाने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा किसकी है, तो भारी बहुमत ने केंद्र और राज्य सरकारों का नाम लिया. 63 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि रोजगार योग्य बनाने की मुख्य जिम्मेदारी केंद्र-राज्य सरकारों की है।
इसके बाद 14 प्रतिशत ने स्कूल-कॉलेज को जिम्मेदार ठहराया, 9 प्रतिशत ने निजी नियोक्ताओं को और सिर्फ 5 प्रतिशत ने आम लोगों व परिवार को इस जिम्मेदारी का हिस्सा माना. ये आंकड़े बताते हैं कि युवा रोजगार के मामले में सबसे ज्यादा सरकार पर निर्भर हैं।
अभी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
सर्वे में लोगों से यह भी पूछा गया कि अभी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता क्या होनी चाहिए. सबसे ज्यादा 23 प्रतिशत लोगों ने शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार को प्राथमिकता दी. 21 प्रतिशत ने बुनियादी ढांचा और पूंजीगत खर्च बढ़ाने की बात कही. 18 प्रतिशत का मत था कि सभी क्षेत्रों को बराबर प्राथमिकता दी जाए, जबकि 16 प्रतिशत ने सीधे परिवारों को मदद पहुंचाने की वकालत की. टैक्स घटाने की मांग 8 प्रतिशत लोगों ने की और सामाजिक सद्भाव बढ़ाने को सिर्फ 4 प्रतिशत ने सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।
इससे साफ है कि शिक्षा-स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी जनता की नजर में सबसे ऊपर हैं।
CJP को चुनाव भी लड़ना चाहिए?
एमओटीएन सर्वे में छात्रों के नए संगठन सीजेपी को लेकर भी दिलचस्प नतीजे आए. जब पूछा गया कि सीजेपी दबाव समूह बने रहना चाहता है तो आप क्या कहेंगे, तो 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह केवल दबाव समूह ही बने रहें. वहीं 26 प्रतिशत का मत था कि सीजेपी को चुनाव भी लड़ना चाहिए।
सीजेपी चुनाव लड़े तो क्या आप उसे वोट देंगे?
आगे जब यह सवाल पूछा गया कि अगर सीजेपी चुनाव लड़े तो क्या आप उसे वोट देंगे, तो 33 प्रतिशत लोगों ने हां कहा. वहीं 43 प्रतिशत लोगों ने नकारात्मक जवाब दिया. ये आंकड़े दिखाते हैं कि सीजेपी को लेकर जनता में दिलचस्पी तो है, लेकिन अभी वह व्यापक चुनावी समर्थन जुटाने की स्थिति में नहीं दिख रही।
बता दें कि मूड ऑफ द नेशन सर्वे के जरिए यह समझने की कोशिश की गई है कि जेन-जी प्रोटेस्ट के बाद देश की सोच और प्राथमिकताओं में कितना बदलाव आया है. क्या युवाओं का असंतोष किसी बड़े बदलाव का संकेत है या हालात सामान्य हो रहे हैं?
सर्वे में लोगों से सीधे सवाल पूछकर यह जानने की कोशिश की गई कि आखिर क्या भारत का मूड बदल रहा है? आने वाले समय में जनता की सोच किस दिशा में जाती है और इसका असर 2029 के चुनावी मैदान पर कितना दिखाई देता है, यह भी इस सर्वे के अहम सवालों में शामिल है।
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