भोपाल
उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और संवेदना के साथ समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझना भी है। बेटियां अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य से आगे बढ़ते हुए परिवार, मातृभूमि, समाज एवं राष्ट्र के प्रति सदैव कृतज्ञता का भाव रखें और राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं। मंत्री परमार बुधवार को भोपाल स्थित शासकीय गीतांजलि कन्या स्नातकोत्तर (स्वशासी) महाविद्यालय में आयोजित ‘प्राचार्य पदक वितरण समारोह’ में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर विभिन्न संकायों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली छात्राओं को प्राचार्य पदक प्रदान कर उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।
मंत्री परमार ने कहा कि हमारी बेटियों की उपलब्धियां केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र की प्रगति का गौरवपूर्ण अध्याय हैं। उत्कृष्टता का सम्मान विद्यार्थियों को और बेहतर करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने छात्राओं से कहा कि वे अपने ज्ञान और प्रतिभा का उपयोग समाज एवं राष्ट्र के कल्याण के लिए करें और अपने जीवन में कर्तव्य, संस्कार तथा राष्ट्रभाव को सर्वोच्च स्थान दें।
भारतीय ज्ञान परंपरा को शोध और अनुसंधान से आगे बढ़ाएं
मंत्री परमार ने भारतीय पुरातन ज्ञान परंपरा की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत का ज्ञान सदैव सार्वभौमिक और मानव कल्याण की भावना से युक्त रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से संबंधित समृद्ध ज्ञान विद्यमान है। आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी इस ज्ञान को समझे और उसके युगानुकूल परिप्रेक्ष्य में शोध, अनुसंधान एवं दस्तावेजीकरण के माध्यम से आगे बढ़ाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने स्वत्व के जागरण, भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने और राष्ट्र के पुनर्निर्माण में योगदान देने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया है। नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों के ज्ञान, कौशल, संस्कार और समग्र व्यक्तित्व विकास पर केंद्रित है।
परमार ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय भावना की वैश्विक प्रासंगिकता का उल्लेख करते हुए कहा कि कोविड महामारी के दौरान भारत ने मानवता के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए इस भावना को सार्थक किया। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग दिखाती है।
मंत्री परमार ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं, बल्कि ज्ञान, सामर्थ्य और आत्मनिर्भरता से युक्त भारत के निर्माण का संकल्प है। भारत वर्ष 2047 तक विश्व के अन्य देशों की खाद्यान्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में भी सक्षम और सामर्थ्यवान बनेगा। इस संकल्प को साकार करने में युवा शक्ति और विशेषकर बेटियों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
महाविद्यालय के विकास के लिए महत्वपूर्ण घोषणाएं
इस अवसर पर मंत्री परमार ने महाविद्यालय को 100 कंप्यूटर उपलब्ध कराने तथा छात्रावास एवं ऑडिटोरियम के अनुरक्षण के लिए ₹1 करोड़ की राशि स्वीकृत करने की घोषणा की। उन्होंने महाविद्यालय की कैंटीन का नाम ‘अन्नपूर्णा’, छात्रावास का नाम ‘मैत्रेयी’, क्रीड़ा भवन का नाम ‘पी.टी. उषा भवन’ तथा विज्ञान भवन का नाम ‘गार्गी भवन’ किए जाने की घोषणा भी की।
समारोह में महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. जय मिश्रा ने महाविद्यालय की उपलब्धियों एवं शैक्षणिक गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि महाविद्यालय को वर्ष 2011 में स्वशासी का दर्जा प्राप्त हुआ है तथा वर्तमान में 13 विषयों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम संचालित हैं। महाविद्यालय में बी.ए. नृत्य एवं मनोविज्ञान विषय प्रारंभ करने तथा कौशल विकास पाठ्यक्रम शुरू करने का प्रस्ताव भी रखा गया।
कार्यक्रम में वार्ड पार्षद मनोज राठौर एवं अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा डॉ. मथुरा प्रसाद सहित महाविद्यालय के प्राध्यापकगण, छात्राएं एवं उनके अभिभावक उपस्थित थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ वंदे मातरम् एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। संचालन डॉ. सुनीता जैन तथा आभार प्रदर्शन डॉ. जया शर्मा ने किया। पुरस्कार वितरण समिति की संयोजक डॉ. शैलजा सोनी का आयोजन में विशेष योगदान रहा।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
