लूनी नदी प्रदूषण मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, नदी किनारे 500 मीटर तक नए लाल श्रेणी के उद्योगों पर रोक

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जोधपुर
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में लूनी, बांडी और जोजरी नदी तंत्र के प्रदूषण और अवैध बजरी खनन पर गंभीर चिंता जताते हुए नदी क्षेत्रों के आसपास नए औद्योगिक इकाइयों की स्थापना पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने अवैध बजरी खनन के संगठित नेटवर्क, इसमें शामिल लोगों, लाभार्थियों और सरकारी अधिकारियों की संभावित मिलीभगत की जांच के लिए तीन दिन में विशेष जांच दल (एसआइटी) गठित करने का निर्देश दिया है।

एसआईटी में जोधपुर, बालोतरा और पाली के पुलिस अधीक्षक शामिल होंगे तथा इसका नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक स्तर का अधिकारी करेगा।न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की पीठ ने लूनी नदी प्रदूषण से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले में यह आदेश दिया।कोर्ट ने कहा कि अवैध खनन वाले क्षेत्रों में बाद में खनन पट्टे जारी कर देने से पहले की अवैध गतिविधियों को वैधता नहीं मिल सकती। खनन पट्टा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जारी होना और खनन गतिविधियों का पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों के अनुरूप होना दो अलग-अलग आवश्यकताएं हैं।

पीठ ने जल संसाधन विभाग की ओर से सीवेज और उपचारित गंदे पानी के प्रवाह के आधार पर नदियों की चौड़ाई और सीमाएं नए सिरे से निर्धारित करने की कवायद को गलत ठहराया। कोर्ट ने कहा कि नदी की भौगोलिक सीमा और प्राकृतिक स्वरूप का निर्धारण उसमें बहने वाले सीवेज की मात्रा से नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने नदी की राजस्व और जल संसाधन विभाग के अभिलेखों में दर्ज बाहरी सीमाओं के दोनों ओर 100 मीटर अतिरिक्त सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखने तथा इन सीमाओं से 500 मीटर के भीतर लाल श्रेणी के उद्योग स्थापित नहीं करने का निर्देश दिया। हाई फ्लड लाइन और सुरक्षा क्षेत्र का वैज्ञानिक निर्धारण होने तक नदी क्षेत्र के आसपास नए औद्योगिक प्रतिष्ठानों की अनुमति भी नहीं दी जा सकेगी।

458 हेक्टेयर में खनन पर भी चिंता
कोर्ट ने बालोतरा जिले की पचपदरा तहसील के कनाना गांव में 458.6 हेक्टेयर क्षेत्र और करीब 8.1 किलोमीटर नदी तल में फैले पांच लगातार खनन भूखंडों का उल्लेख करते हुए इनके सामूहिक पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने की आवश्यकता जताई। तीन भूखंडों में खनन शुरू हो चुका है, जबकि अन्य दो के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति लंबित है। समिति ने इन दो भूखंडों को पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं देने की सिफारिश की है। पीठ ने खनन विभाग की उस दलील पर भी सवाल उठाए, जिसमें पूर्व में अवैध खनन पाए गए क्षेत्रों में बाद में पट्टे जारी होने को नियमित खनन गतिविधि बताया गया था। कोर्ट ने कहा कि इससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह, नदी तल, भूजल पुनर्भरण और पर्यावरण पर पड़ने वाले संचयी प्रभाव का आकलन नहीं हो जाता।

भूजल की स्थिति पर भी मांगी रिपोर्ट
शीर्ष कोर्ट ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण को पक्षकार बनाने और जोधपुर, बालोतरा तथा पाली जिलों में भूजल की उपलब्धता, दोहन और गिरावट की स्थिति पर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया। बालोतरा क्षेत्र में भूजल की गंभीर स्थिति और औद्योगिक गतिविधियों के प्रभाव को लेकर उठाए गए सवालों पर राज्य सरकार से अलग शपथ पत्र भी मांगा है।पीठ ने जोधपुर, पाली और बालोतरा के औद्योगिक क्षेत्रों में साझा अपशिष्ट उपचार संयंत्रों और शून्य तरल अपशिष्ट उत्सर्जन व्यवस्था की धीमी प्रगति पर चिंता जताई। राज्य को औद्योगिक इकाइयों के लिए शून्य तरल अपशिष्ट उत्सर्जन संयंत्र लगाने के लिए वित्तीय सहायता की नीति बनाने तथा उपचारित पानी के पुन: उपयोग के लिए पाइपलाइन नेटवर्क तैयार करने के निर्देश दिए।कोर्ट ने मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह को न्याय मित्र नियुक्त किया है। मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।