भोपाल
पूर्व सांसद कृष्ण मुरारी मोघे ने मध्यप्रदेश में कपास खरीदी पर लगने वाले मंडी शुल्क पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर कहा है कि इसके कारण लाखों किसानों और मजदूरों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। प्रदेश में कपास खरीदी पर मंडी शुल्क 1.70 प्रतिशत है जो पड़ोसी राज्यों से काफी अधिक है। इसे 0.50 प्रतिशत किए जाने की मांग लंबे समय से की जा रही है लेकिन इसे अनदेखा किया जा रहा है। सीएम चौहान को लिखे पत्र में मोघे ने कहा है कि कपास खरीदी के मामले में किसानों और व्यापारियों के हितों की अनदेखी प्रदेश में हो रही है। मंडी शुल्क ज्यादा होने और मांगों पर ध्यान नहीं देने के चलते कपास व्यवसायी और जीनिंग फैक्ट्रियां 11 अक्टूबर से हड़ताल पर चले गए हैं और इस हालत में लाखों किसानों को अपनी कपास की उपज बेचने के लिए भटकना पड़ रहा है। इस हालात में मजदूर भी बेरोजगार हैं और अब जबकि दीपावली का त्यौहार सामने है तो किसानों और मजदूरों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
सीमावर्ती राज्यों में काफी कम है टैक्स
मोघे ने पत्र में कहा है कि प्रदेश के सीमावर्ती राज्य गुजरात और महाराष्ट्र में कपास फसल पर मंडी शुल्क 0.25 और 0.50 प्रतिशत लगता है। इसलिए एमपी का अधिकांश कपास बाहरी राज्यों की मंडियों में बिकने के लिए जा रहा है और इससे राज्य सरकार को राजस्व हानि उठाना पड़ रही है। गुजरात और महाराष्ट्र में रुई की गांठ बनने में करीब 100 रुपए मंडी शुल्क लगता है जबकि एमपी में इसके बदले 600 रुपए लगते हैं। इसलिए प्रदेश की अधिकांश जीनिंग फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं और 200 से अधिक फैक्ट्रियां गुजरात व महाराष्ट्र में शिफ्ट हो चुकी हैं। इससे प्रदेश के किसानों और मजदूरों में भारी आक्रोश है। इसलिए मुख्यमंत्री से अनुरोध है कि किसानों के हित में व्यापारियों के साथ सार्थक चर्चा कर हड़ताल खत्म कराई जाए और मंडी शुल्क 0.50 प्रतिशत किए जाने के संबंध में कार्यवाही की जाए।
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